तस्वीर में तेरापंथ भवन में पर्युषण महापर्व के सातवें दिन ध्यान दिवस पर बैठे श्रद्धालु दिख रहे हैं।

श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथी सभा आदर्श नगर, सवाई माधोपुर के तत्वावधान में आयोजित पर्युषण महापर्व के सातवें दिन को ध्यान दिवस के रूप में मनाया गया। तेरापंथ भवन आदर्श नगर में आयोजित कार्यक्रम में प्रवक्ता उपासक पारसमल दुगड़ एवं सहयोगी उपासक रमेश कुमार सिंघवी, मुंबई के मार्गदर्शन में ध्यान और आत्मचिंतन के महत्व पर प्रकाश डाला गया।

कार्यक्रम की शुरुआत सभा अध्यक्ष अनिल जैन द्वारा प्रस्तुत मंगलाचरण से हुई। इस अवसर पर प्रवक्ता उपासक पारसमल दुगड़ ने कहा कि आठ दिन आत्मा के आठ सोपान हैं। यदि पर्युषण को एक शरीर माना जाए तो ध्यान उसका प्राण है। बिना ध्यान के सारा तप, सारा जप और सारा स्वाध्याय अधूरा है।

उन्होंने आचार्य श्री महाप्रज्ञजी के ध्यान संबंधी विचारों को रखते हुए बताया कि उन्हें ध्यान के वैज्ञानिक कहा जाता है। उन्होंने ध्यान की सरल परिभाषा देते हुए कहा कि ध्यान है, चित्त का वर्तमान में टिकना। हमारा मन या तो भूत में पछताता है या भविष्य में भटकता है, जबकि वर्तमान में वह टिकता ही नहीं। ध्यान वह कला है, जो मन को वर्तमान में लाती है और अपने भीतर लाती है।

उपासक पारसमल दुगड़ ने बताया कि आचार्य श्री महाश्रमण जी फरमाते हैं, "ध्यान आत्मा का भोजन है। जैसे भोजन बिना शरीर दुर्बल हो जाता है, ध्यान बिना आत्मा दुर्बल हो जाती है।"

उन्होंने आगे बताया कि सन् 1975 में आचार्य श्री तुलसी और आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी ने वर्षों की साधना के बाद प्रेक्षा ध्यान पद्धति का विकास किया। प्रेक्षा का अर्थ गहराई से देखना और राग-द्वेष रहित देखना है। यह केवल आंखें बंद करना नहीं, बल्कि भीतर जागना है।

उन्होंने कहा कि पर्युषण में हम क्षमा मांगते हैं। क्षमा मांगने के लिए मन को झुकाना पड़ता है और मन को झुकाने के लिए मन को देखना पड़ता है। बिना ध्यान के हम अपने कषायों को देख ही नहीं सकते।

सहयोगी उपासक रमेश कुमार सिंघवी ने इस अवसर पर बताया कि प्रेक्षा ध्यान वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है कि यह ब्लड प्रेशर, अनिद्रा और चिंता को कम करता है। उन्होंने कहा कि प्रेक्षा ध्यान कहता है, "क्रोध को देखो, दबाओ मत।" जो देख लेता है, वह जीत जाता है। जो भीतर नहीं गया, वह तीर्थ जाकर भी भटका है। जो भीतर गया, वह घर बैठे ही तर गया।

कार्यक्रम के अंतिम सोपान में सभा अध्यक्ष अनिल जैन ने पर्युषण काल के दौरान आयोजित गतिविधियों की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने उपासक द्वय के मार्गदर्शन की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए साधुवाद प्रेषित किया। इस तरह पर्युषण महापर्व के सातवें दिन ध्यान के माध्यम से आत्मचिंतन और भीतर की यात्रा के महत्व को केंद्र में रखा गया।

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