तस्वीर में बृहन्मुंबई महानगरपालिका के पत्रकार कक्ष में प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते जनप्रतिनिधि।

मुंबई। मुंबई में 14 फीट से अधिक ऊंचाई वाली झोपड़ियों पर बीएमसी प्रशासन द्वारा तोड़ाव कार्रवाई की घोषणा के बाद राजनीतिक विवाद गहरा गया है। इस फैसले को लेकर बीएमसी की कार्यप्रणाली और प्रशासन तथा जनप्रतिनिधियों के बीच समन्वय पर भी सवाल उठने लगे हैं।

शहर की प्रथम नागरिक और बीएमसी महापौर रितू तावड़े से जब इस बड़े फैसले के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि उन्हें इस मामले की कोई जानकारी नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अधिकारियों से बात करने के बाद ही कोई बयान देंगी। महापौर के इस बयान के बाद विपक्ष ने बीएमसी प्रशासन और सत्ताधारी पार्टी पर जोरदार हमला बोला।

विपक्ष का कहना है कि इतने बड़े फैसले से महापौर का बेखबर रहना बेहद चिंताजनक है। विपक्ष ने इसे बीएमसी आयुक्त और महापौर के बीच तालमेल की भारी कमी से जोड़ते हुए प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।

इस विवाद की गूंज बीएमसी की स्थायी समिति की बैठक में भी सुनाई दी। बैठक में विभिन्न राजनीतिक दलों के नगरसेवकों ने बीएमसी प्रशासन की कार्यप्रणाली का कड़ा विरोध जताया। जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि इतने बड़े पैमाने पर होने वाली कार्रवाई की जानकारी जनप्रतिनिधियों को देने के बजाय सीधे मीडिया के जरिए सामने लाई गई।

बीजेपी के सदन नेता गणेश खणकर और शिवसेना के वरिष्ठ नगरसेवक यशोधर फणसे सहित कई नेताओं ने बीएमसी आयुक्त अश्विनी भिडे को पत्र लिखकर इस तोड़ाव अभियान को तुरंत रोकने की मांग की है।

नेताओं का कहना है कि मुंबई की झुग्गियों में रहने वाले अधिकांश लोग गरीब और वंचित वर्ग से हैं, जो कई दशकों से वहां निवास कर रहे हैं। उनका कहना है कि बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था और पुनर्वास योजना के अचानक उनके आशियानों को तोड़ना उनके साथ बड़ा अन्याय होगा।

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने भी मांग की है कि प्रशासन इस विवादित फैसले को तुरंत वापस ले और जनप्रतिनिधियों को विश्वास में लेकर ही आगे की नीति बनाए। 14 फीट से अधिक ऊंचाई वाली झोपड़ियों पर प्रस्तावित तोड़ाव कार्रवाई को लेकर बीएमसी में उठा यह विवाद अब प्रशासनिक फैसले, जनप्रतिनिधियों की भूमिका और पुनर्वास व्यवस्था के सवालों तक पहुंच गया है।

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