चेम्बूर में आयोजित नवरात्रि अनुष्ठान के दौरान मंच पर प्रवचन देतीं साध्वी निर्वाणश्री और अन्य साध्वियां।   

चेम्बूर में आचार्य महाश्रमण की विदुषी सुशिष्या साध्वी निर्वाणश्री के पावन सान्निध्य में आयोजित नवरात्रि अनुष्ठान में श्रावक-श्राविकाएं भक्ति और आध्यात्मिक साधना में लीन हैं। अनुष्ठान के छठे दिन अंतराय कर्म के संदर्भ में विस्तार से मीमांसा की गई। इस दौरान साध्वी निर्वाणश्री ने श्रद्धालुओं को दूसरों के कार्यों में बाधा न डालने और अहंकार से दूर रहने का संदेश दिया।

विशाल श्रावक समाज को संबोधित करते हुए विदुषी साध्वी निर्वाणश्री ने कहा कि हमें किसी को अंतराय नहीं देना चाहिए और न ही अहंकार करना चाहिए। जो व्यक्ति दूसरों के कार्यों में अंतराय उत्पन्न करता है, वह स्वयं के लिए भी रुकावटों को आमंत्रित करता है। उन्होंने कहा कि अंतराय कर्म को हल्का करने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को अपने दैनिक जीवन की छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देना चाहिए, ताकि वह ऐसे कर्मों से बच सके।


इस अवसर पर साध्वी योगक्षेमप्रज्ञा ने अपने सारगर्भित वक्तव्य में जैन दर्शन के कर्मवाद की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि जैन दर्शन में मान्य कर्मवाद पूर्ण वैज्ञानिक सिद्धांत है। कॉज और इफेक्ट की थ्योरी भाव-जगत पर आधारित है। भगवान महावीर ने कर्मों के संदर्भ में सूक्ष्म विवेचन प्रस्तुत किया है। कर्मों को हल्का करने के लिए ध्यान और जप का आलंबन लेना चाहिए।

नवरात्रि अनुष्ठान के दौरान प्रतिदिन भक्तामर के संगान के साथ जप अनुष्ठान प्रारंभ होता है। इस दौरान ‘चंदेसु निम्मलयरा’ और ‘धम्मो मंगलमुक्किट्ठं’ सहित अन्य पदों के सामूहिक संगान में श्रद्धालुओं की तन्मयता देखते ही बनती है। चेम्बूर में आयोजित यह अनुष्ठान साधना, जप और आध्यात्मिक चिंतन के माध्यम से श्रद्धालुओं को अंतराय कर्म के स्वरूप तथा उससे बचने के उपायों पर मनन करने का अवसर प्रदान कर रहा है।

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