तस्वीर में श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में आयोजित धर्मसभा के दौरान मुनिश्री और उपस्थित श्रद्धालु नजर आ रहे हैं।

श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में 09 सितम्बर को आयोजित धर्मसभा में मुनि श्री प्रणव सागर जी महाराज ने श्रमण और श्रावक धर्म की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि श्रमण धर्म धर्म का रथ है तो श्रावक उस रथ के पहिए हैं। उन्होंने कहा कि दोनों के समन्वय से ही धर्म की प्रभावना और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।

परम पूज्य ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य में हुई धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री प्रणव सागर जी महाराज ने कहा कि जैनागम में धर्म के दो प्रमुख स्वरूप बताए गए हैं—श्रमण धर्म और श्रावक धर्म। श्रमण अपनी कठोर संयम साधना, त्याग और तप के माध्यम से धर्म की प्रभावना करते हैं, जबकि श्रावक अपने आचरण, श्रद्धा और सेवा के माध्यम से धर्मरथ को गति प्रदान करता है।

मुनिश्री ने कहा कि श्रमण और श्रावक एक-दूसरे के पूरक हैं। श्रमण धर्म के आदर्श को प्रस्तुत करते हैं और श्रावक उस आदर्श को अपने गृहस्थ जीवन में उतारकर समाज एवं आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का कार्य करते हैं।

उन्होंने कहा कि वास्तविक श्रावक वही है, जो श्रद्धावान, विवेकवान और क्रियावान हो तथा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र—रत्नत्रय की ओर निरंतर आगे बढ़ने का पुरुषार्थ करे। जैन श्रावक को अपने जैन कुलाचार एवं धार्मिक संस्कारों का पालन करना चाहिए। उसका आचरण ऐसा हो कि उसे देखकर लोग स्वयं पहचान सकें कि यह जैन कुल का व्यक्ति है।

मुनि श्री ने कहा कि केवल नाम से जैन होना पर्याप्त नहीं है। जैन धर्म हमारी वाणी, व्यवहार, खान-पान, जीवनशैली और संस्कारों में दिखाई देना चाहिए। यही श्रावक धर्म की वास्तविक सार्थकता है।

वर्तमान खान-पान की प्रवृत्तियों पर चिंता व्यक्त करते हुए मुनिश्री ने जैन श्रावकों को फास्ट फूड और ऐसे खाद्य पदार्थों के प्रति विशेष सावधानी बरतने का संदेश दिया, जिनमें मांसाहार अथवा अन्य अभक्ष्य पदार्थों के सेवन का दोष लग सकता है। उन्होंने कहा कि एक ओर मुनिराज कठिन संयम चर्या के माध्यम से धर्म की प्रभावना कर रहे हैं और दूसरी ओर यदि श्रावक अपने अनुचित आचरण से धर्म की अप्रभावना करे तो यह आत्मचिंतन का विषय है। श्रावक का खान-पान भी उसके धर्म और संस्कारों का परिचायक होना चाहिए।

मुनि श्री प्रणव सागर जी महाराज ने श्रावकों से अपने जीवन में षट् आवश्यक—देव पूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप और दान—को पूर्ण श्रद्धा एवं संकल्प के साथ अपनाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि इन धार्मिक कर्तव्यों को केवल अवसर विशेष तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इन्हें जीवन का अभिन्न अंग बनाना चाहिए। जब धर्म दिनचर्या का हिस्सा बनता है, तभी उसका वास्तविक प्रभाव जीवन और परिवार पर दिखाई देता है।

मुनिश्री ने कहा कि धर्म का प्रभाव सबसे पहले आचरण में दिखाई देना चाहिए। जब श्रावक अपने जीवन में संयम, संस्कार और सदाचार को उतारता है, तब उसका जीवन स्वयं धर्म की प्रभावना का माध्यम बन जाता है। श्रावक को निरंतर आत्मचिंतन करना चाहिए कि क्या उसका आचरण उसके धर्म और जैन कुल की गरिमा के अनुरूप है।

उन्होंने कहा कि यदि जीवन जिनवाणी की शिक्षाओं के अनुरूप होगा तो व्यक्ति स्वयं भी आत्मकल्याण की ओर बढ़ेगा और समाज में धर्म की प्रभावना का कारण भी बनेगा। धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने मुनिश्री के मंगल प्रवचन का श्रद्धापूर्वक श्रवण किया तथा आत्मचिंतन, संयम, संस्कार एवं धर्ममय जीवन जीने का संकल्प लिया।

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