हापुड़ में सुबह की पहली किरण के साथ हुआ रावण दहन, 85 साल पुरानी है परंपरा
उत्तर प्रदेश के हापुड़ में दशहरे पर शाम के बजाय सूर्योदय के समय रावण दहन किया जाता है। जानिए 21 अक्टूबर को दिल्ली रोड स्थित रामलीला मैदान में निभाई गई इस अनोखी परंपरा के पीछे का इतिहास और वर्ष 1941 से जुड़ी इसकी कहानी।
उत्तर प्रदेश के हापुड़ में दशहरा उत्सव की एक अनोखी परंपरा के तहत बुधवार, 21 अक्टूबर को सुबह तड़के रावण दहन किया गया। देश के अधिकांश हिस्सों में दशहरे पर शाम ढलने के बाद रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है, लेकिन हापुड़ में यह परंपरा रात के बजाय सूर्योदय के समय निभाई जाती है। करीब 85 साल से चली आ रही इस परंपरा के अनुसार दिल्ली रोड स्थित रामलीला मैदान में रावण के विशाल पुतले को अग्नि के हवाले किया गया।
रामलीला मैदान में चल रहे रामलीला महोत्सव के दौरान बुधवार तड़के कुंभकर्ण, मेघनाद और रावण वध के साथ पूरा पंडाल ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष से गूंज उठा। इस अवसर पर मैदान में आतिशबाजी की गई, जिससे आसमान रोशनी से भर गया। रंग-बिरंगी आतिशबाजी और धमाकों के बीच रावण दहन का दृश्य देखने के लिए हजारों लोग मौजूद रहे।
हापुड़ में सुबह के समय रावण दहन की परंपरा के पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ स्थानीय इतिहास और ग्रामीणों की सुरक्षा से जुड़ी परिस्थितियां भी रही हैं। आम लोगों की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखकर शुरू की गई यह व्यवस्था समय के साथ शहर के दशहरा उत्सव की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बन गई।
करीब 85 साल पहले, वर्ष 1941 में, हापुड़ का दशहरा मेला आसपास के ग्रामीण इलाकों के लोगों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र था। शहर से 10 से 15 किलोमीटर दूर स्थित गांवों से परिवार पारंपरिक बैलगाड़ियों में सवार होकर मेला देखने पहुंचते थे। दिनभर मेले में घूमने, खरीदारी करने, बच्चों के मनोरंजन और मेल-मुलाकात के बाद ग्रामीण परिवारों को अपने गांवों की ओर लौटना पड़ता था।
उस दौर में यातायात के साधन आज की तरह सुगम नहीं थे। रात के समय ग्रामीण रास्तों पर सफर करना जोखिम भरा माना जाता था। ग्रामीणों को अंधेरे में असुरक्षित रास्तों और संभावित खतरों से बचाने के लिए ऐसी व्यवस्था बनाई गई कि वे रातभर मेले में रुककर उसकी रौनक का आनंद लें, खरीदारी करें और सुबह होने का इंतजार करें। सूरज की पहली किरण दिखाई देने के बाद रावण दहन किया जाता था, ताकि लोग दिन के उजाले में सुरक्षित अपने घर लौट सकें।
समय के साथ यातायात के साधनों में बदलाव आया, लेकिन सुबह रावण दहन की परंपरा जारी रही। अब यह हापुड़ के दशहरा उत्सव का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। शहर के बुजुर्गों और पुराने निवासियों के लिए यह पीढ़ियों से चली आ रही विरासत है, जबकि नई पीढ़ी के लिए सुबह के समय रावण दहन देखना एक अलग अनुभव है।
इस वर्ष भी बड़ी संख्या में लोग पूरी रात दशहरा मेले में रुके रहे और बुधवार सुबह रावण दहन के साक्षी बने। करीब 85 साल पहले ग्रामीणों की सुरक्षित वापसी को ध्यान में रखकर शुरू हुई यह व्यवस्था आज भी हापुड़ की सांस्कृतिक परंपरा के रूप में निभाई जा रही है।