ऋषभदेव में 800 वर्ष पुरानी रथोत्सव परंपरा, चांदी के छत्रों से सजेगा प्राचीन रथ
ऋषभदेव में 800 वर्ष पुराने प्राचीन रथों से जुड़ी रथोत्सव परंपरा फिर दिखाई देगी। चांदी के छत्रों से सजे रथ, भगवान जिनेंद्र की नगर परिक्रमा, पारंपरिक नृत्य और महाआरती आयोजन के प्रमुख पक्ष हैं।
तस्वीर में ऋषभदेव रथोत्सव के दौरान सजाए गए प्राचीन लकड़ी के रथ नजर आ रहे हैं।
ऋषभदेव (प्रातः काल संवाददाता)। ऋषभदेव में आयोजित होने वाले दो दिवसीय रथोत्सव में लगभग 800 वर्ष पुराने प्राचीन लकड़ी के रथों की परंपरा एक बार फिर दिखाई देगी। रथों को चांदी के छत्रों, पुष्पमालाओं और पारंपरिक सजावट से सजाया जाता है। भगवान जिनेंद्र को देव विमानों एवं रथों में विराजमान कर नगर भ्रमण कराया जाता है।
प्राचीन रथों के साथ श्रद्धालुओं की भीड़, भगवान के जयकारे और भक्ति गीतों से नगर का वातावरण धार्मिक रंग में दिखाई देता है। ऐतिहासिक रथों के दर्शन श्रद्धालुओं के लिए आस्था के साथ गौरवशाली परंपरा से जुड़ने का अवसर होते हैं।
रथोत्सव के अवसर पर ऋषभदेव के मार्गों पर सांस्कृतिक परंपराओं की झलक दिखाई देती है। पुरुष पारंपरिक सफेद वस्त्र और पाग धारण कर रथयात्रा में शामिल होते हैं, जबकि महिलाएं पारंपरिक चूंदड़ पहनकर गेर और गरबा नृत्य के माध्यम से अपनी धार्मिक श्रद्धा और उल्लास व्यक्त करती हैं। रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगाते मार्ग, सुसज्जित धार्मिक स्थल और भक्ति में शामिल श्रद्धालु आयोजन का स्वरूप बदल देते हैं। रथोत्सव धार्मिक परंपराओं के साथ मेवाड़ की लोक संस्कृति और सामाजिक एकता का भी परिचय देता है।
रथोत्सव की पारंपरिक रूपरेखा के अनुसार प्रथम दिवस भगवान जिनेंद्र की रथयात्रा मुख्य मंदिर से शुरू होकर नगर के विभिन्न मार्गों से गुजरती हुई निर्धारित पारंपरिक पड़ाव स्थल पाटूना चौक पहुंचती है। यहां रात्रि विश्राम के साथ पहले दिन के आयोजन का विराम होता है।
द्वितीय दिवस रथयात्रा पुनः आगे बढ़ती है। मसानिया तालाब अथवा निर्धारित पारंपरिक स्थल पर रथों का आमने-सामने मिलन रथोत्सव के प्रमुख आकर्षणों में शामिल रहता है। इस अवसर पर श्रद्धालुओं में उत्साह और भक्ति का वातावरण दिखाई देता है।
देर रात धूलेव भंडार के जवानों द्वारा पारंपरिक सलामी एवं परेड प्रस्तुत की जाती है। इसके बाद भव्य महाआरती के साथ दो दिवसीय रथोत्सव का धार्मिक एवं पारंपरिक समापन होता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार यह आयोजन भगवान नेमिनाथ के विवाह प्रसंग की स्मृति तथा आत्मशुद्धि के महापर्व दशलक्षण पर्युषण की आराधना पूर्ण होने के उल्लास से जुड़ा है। पर्युषण पर्व के दौरान उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, संयम, तप और त्याग जैसे धर्मगुणों की आराधना की जाती है। रथोत्सव इसी आध्यात्मिक साधना के बाद श्रद्धा और उल्लास की सामूहिक अभिव्यक्ति के रूप में सामने आता है।
ऋषभदेव का ऐतिहासिक रथोत्सव केवल धार्मिक यात्रा तक सीमित नहीं है, बल्कि सदियों से संरक्षित आस्था, संस्कृति और सामाजिक समरसता की परंपरा से जुड़ा आयोजन है। लगभग आठ शताब्दियों पुराने रथों से जुड़ी परंपरा, भगवान जिनेंद्र की नगर परिक्रमा और श्रद्धालुओं की सामूहिक सहभागिता इसे मेवाड़ की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान से जोड़ती है।
रथोत्सव पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा के संरक्षण, धार्मिक चेतना के प्रसार और समाज की एकजुटता से जुड़ा आयोजन है, जिसमें इतिहास, भक्ति और संस्कृति एक साथ दिखाई देते हैं।