इंद्रिय संयम और मन के परिष्कार से ही मानव जीवन की सार्थकता: कोमल मुनि
खेरोदा के जैन स्थानक भवन में कोमल मुनि महाराज ने इंद्रिय संयम, मन के परिष्कार, अपरिग्रह और सत्संगति का महत्व बताया। हर्षित मुनि ने सुदर्शन श्रावक के जीवन से कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा दी।
तस्वीर में, जैन संत श्री वर्द्धमान जैन श्रावक संस्थान, खरोदा के मंच पर बैठे हुए धर्मसभा को संबोधित कर रहे हैं, जिसमें उपस्थित भक्त मास्क पहने हुए हैं।
खेरोदा। कस्बे के जैन स्थानक भवन में 12 सितंबर 2026 को आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए मेवाड़ उप प्रवर्तक गुरुदेव कोमल मुनि महाराज ने कहा कि मनुष्य जीवन की सच्ची सार्थकता इंद्रियों के संयम और मन के परिष्कार में निहित है। उन्होंने कहा कि जब तक व्यक्ति की पांचों इंद्रियां उसके पूर्ण नियंत्रण में नहीं होतीं, तब तक मनुष्यता की वास्तविक साधना अधूरी रहती है।
गुरुदेव कोमल मुनि महाराज ने कहा कि रसना सहित सभी इंद्रियों का असंयमित उपयोग व्यक्ति के आध्यात्मिक और शारीरिक पतन का कारण बनता है। सही मार्ग पर चलने के लिए इंद्रियों पर अंकुश रखना और उनका सदुपयोग करना अनिवार्य है।
उन्होंने परिग्रह के त्याग और वासनाओं से मुक्ति पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि जीवन में सच्चा परिणाम तभी मिलता है, जब व्यक्ति मोह, वासना और निरर्थक कल्पनाओं से परे होकर अपरिग्रह के भाव को आत्मसात करे। गुरुदेव ने संगति के प्रभाव को रेखांकित करते हुए कहा कि कुसंगति बुद्धि को भ्रष्ट कर मनुष्य को विनाश की ओर धकेलती है, जबकि सत्संगति और विवेक से व्यक्ति दुर्गुणों से मुक्त होकर निर्मल दृष्टि प्राप्त करता है। इंद्रियों को वश में कर कुसंगति का त्याग करने पर ही जीवन सही अर्थों में सार्थक बन पाता है।
सभा में अध्ययनशील, सेवारत्न हर्षित मुनि ने सुदर्शन श्रावक के जीवन का उदाहरण देते हुए कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार सुदर्शन श्रावक ने हिंसक अर्जुन माली जैसे साक्षात काल की भी परवाह किए बिना प्रभु परमात्मा के दर्शन का संकल्प पूरा किया, उसी अटूट निष्ठा और समर्पण भाव से हमें भी गुरु भगवंतों के दर्शनार्थ उपस्थित होना चाहिए।
इस अवसर पर जैन स्थानक भवन में अखंड नवकार मंत्र का पाठ किया जा रहा है। वर्द्धमान जैन श्रावक संघ के अध्यक्ष सुनील कूकड़ा एवं मंत्री मुकेश डांगी ने आगंतुक अतिथियों का स्वागत किया।