तस्वीर में कोटा के मंदिर में जैन मुनि का पाद प्रक्षालन करते श्रद्धालु दिख रहे हैं।   

कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में ‘विराग वर्धन वर्षायोग-2026’ के अंतर्गत गणधर मुनि श्री 108 विवर्धनसागर जी महाराज ससंघ के चातुर्मासिक प्रवास के दौरान धर्मसभा आयोजित हुई। धर्मसभा में मुनिश्री ने द्रव्य संग्रह के संदर्भ में जीव, पुद्गल और आकाश सहित जैन दर्शन के विभिन्न तत्वों की व्याख्या करते हुए श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक दृष्टि से जीवन को समझने का संदेश दिया।

मुनि श्री 108 विवर्धनसागर जी महाराज ने कहा कि देवदर्शन भी मोक्ष का पथ है। जिनदर्शन को पापों का नाशक और मोक्ष का साधन बताया गया है। उन्होंने कहा कि दर्शन में केवल बाहरी औपचारिकता नहीं, बल्कि वास्तविक आध्यात्मिक भाव होना चाहिए। पाषाण में भगवान को देखने के बजाय प्रतिमा के माध्यम से मूर्तिमान भगवान का स्मरण करना चाहिए। जिनालय और जिनप्रतिमाएं आत्मचिंतन तथा भगवान के गुणों के स्मरण का माध्यम हैं।

उन्होंने एक दार्शनिक के प्रसंग के माध्यम से समझाया कि अनेक मंदिरों के दर्शन करने के बाद उसने एक सुंदर मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर की वेदी पर यह संदेश अंकित कराया गया कि संकेत को भगवान न मानकर उसके माध्यम से भगवान को समझने का प्रयास किया जाए। उन्होंने कहा कि प्रतिमा का दर्शन इस भाव को जागृत करे कि भगवान के गुणों का स्मरण हो और आत्मा को उसी दिशा में आगे बढ़ाने की प्रेरणा मिले।

धर्मसभा में मुनिश्री ने आकाश द्रव्य के स्वरूप पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि आकाश द्रव्य सम्पूर्ण लोक को स्थान देता है तथा लोकाकाश और अलोकाकाश का विवेचन किया।

धर्मसभा का शुभारंभ सकल दिगंबर जैन समाज कोटा के अध्यक्ष प्रकाश बज ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। पाद प्रक्षालन मंदिर पदाधिकारियों की ओर से किया गया। सभा में सकल दिगंबर जैन समाज के अध्यक्ष प्रकाश बज, प्रेमचंद दुगेरिया, टीकम पाटनी, पारस बज आदित्य, जितेंद्र धनोपिया, पारस कासलीवाल, पुष्प लुहाड़िया, लाभचंद सोगानी, राजू पाटनी, संदीप बंसल सहित समाज के अनेक सदस्य उपस्थित रहे।

धर्मसभा में देवदर्शन, प्रतिमा के माध्यम से भगवान के गुणों के स्मरण और आकाश द्रव्य के स्वरूप को जैन दर्शन की दृष्टि से समझाया गया।

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