तस्वीर में दिगंबर जैन मुनि को आहार कराते हुए श्रद्धालु और बच्चे दिखाई दे रहे हैं।

कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में ‘विराग वर्धन वर्षायोग-2026’ के अंतर्गत गणधर मुनि श्री 108 विवर्धनसागर जी महाराज ससंघ के चातुर्मासिक प्रवास के दौरान धर्मसभा आयोजित हुई। धर्मसभा में मुनिश्री ने पुद्गल द्रव्य के उपकार, अधर्म द्रव्य के स्वरूप और सम्यग्दर्शन को लेकर प्रवचन दिए।

मुनिश्री विवर्धनसागर जी महाराज ने कहा कि धर्म जीवन का सार है, जबकि अन्य सभी विषय असार हैं। श्रद्धा के माध्यम से ही जीव भगवान बनने की दिशा में आगे बढ़ता है। उन्होंने कहा कि आधे घंटे तक प्रवचन सुनने मात्र से मनुष्य के योगों की प्रवृत्ति अशुभ से हटकर शुभ की ओर होने लगती है। आज सुना गया धर्मोपदेश भविष्य में किसी भी भव में जातिस्मरण के माध्यम से सम्यग्दर्शन का कारण बन सकता है।

मुनिश्री ने कहा कि इसलिए अधर्मद्रव्य सहित छह द्रव्यों के स्वरूप को समझकर सम्यग्दर्शन को दृढ़ करना चाहिए। उन्होंने अधर्म द्रव्य को जीव और पुद्गल के ठहरने में सहायक बताया और कहा कि इसके स्वरूप को जानना भी जरूरी है।

उन्होंने कहा कि मां यदि अपनी संतान और परिवार को धर्म के मार्ग पर ले जाए तो वह सौ शिक्षकों से भी बढ़कर है। जीवन में धर्म को प्राथमिकता देना आवश्यक है। मुनिश्री ने विरागोदय तीर्थ पथरिया में आचार्यश्री के मार्गदर्शन में हुए निर्माण कार्य तथा श्रेयांसगिरि (चांला) में कराए गए जीर्णोद्धार का भी उल्लेख किया।

इस अवसर पर प्रतिष्ठाचार्यक डॉ. आचार्यगुरु भक्त अक्षत भैया का मंदिर कमेटी की ओर से अभिनंदन किया गया। उन्होंने चातुर्मास कराने के महात्म्य पर प्रकाश डाला।

मंदिर अध्यक्ष राजेंद्र गोधा एवं मंत्री पंकज खटोड़ ने बताया कि धर्मसभा में निर्मल अजमेरा, सुरेंद्र पहाड़िया, रामबाबू जैन, राजेंद्र बगड़ा, महावीर बडला, प्रदीप पापड़ीवाल, आशीष ठोला, अशोक पापड़ीवाल, पारस लुहाड़िया, वर्धमान खटोड़ सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं सदस्य उपस्थित रहे। धर्मसभा में दिए गए प्रवचनों में अधर्मद्रव्य सहित छह द्रव्यों के स्वरूप को समझने और सम्यग्दर्शन को दृढ़ करने पर विशेष जोर दिया गया।

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