तस्वीर में श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ का प्रवेश द्वार और नामपट दिख रहा है।

कोटा। श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, रामपुरा के तत्वावधान में आचार्य भगवन 1008 श्री हीराचंद जी म.सा. एवं भावी आचार्य श्री महेंद्र मुनि जी म.सा. के आज्ञानुवर्ती संत रत्न पूज्य श्री नंदीषेण मुनि जी म.सा., पूज्य श्री योगेश मुनि जी म.सा. एवं पूज्य श्री जितेंद्र मुनि जी म.सा. आदि ठाणा-3 के सानिध्य में चातुर्मास तप एवं त्याग के साथ निरंतर गतिमान है। नियमित धर्मसभा में संतों ने श्रावकों को ज्ञान, संयम, सत्य, दया और मध्यस्थ भाव के माध्यम से आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का संदेश दिया।

पूज्य नंदिषेण मुनि महाराज ने श्रावकों को संबोधित करते हुए दैनिक व्यवहार में उपयोग आने वाली वस्तुओं के उदाहरण देकर साधु जीवन की आवश्यकताओं और संयम को समझाया। उन्होंने बताया कि कुछ वस्तुएं व्यवहार में उपयोगी होती हैं, लेकिन साधु उन्हें ग्रहण नहीं करते। तरबूज, सीताफल, अंगूर और किशमिश आदि के उदाहरणों से उन्होंने स्पष्ट किया कि वस्तुओं का उपयोग और उनके प्रति आसक्ति अलग-अलग विषय हैं।

नंदिषेण मुनि ने कहा कि जैन संतों से चमत्कार के बारे में प्रश्न नहीं करना चाहिए। उनसे यह पूछना चाहिए कि ज्ञान और धर्म के माध्यम से संसार में शांति के साथ किस प्रकार जीवन जिया जा सकता है। संतों का उद्देश्य व्यक्ति को चमत्कार दिखाना नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन, कर्म और आत्मा के स्वरूप को समझने की दिशा देना है।

उन्होंने सत्य के महत्व पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि सत्य केवल बोलने का विषय नहीं, बल्कि जीवन में धारण करने का गुण है। सत्य, संयम और सद्भाव के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को अधिक शांत और सार्थक बना सकता है।

पूज्य योगेश मुनि महाराज साहब ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए श्रावक के दया भाव एवं मध्यस्थ भाव पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जीवन में अनेक परिस्थितियां ऐसी आती हैं, जहां व्यक्ति राग-द्वेष और पूर्वाग्रहों में उलझ जाता है। ऐसे समय में मध्यस्थ भाव ही व्यक्ति को संतुलित रखते हुए आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ाता है।

योगेश मुनि ने कहा कि मोक्ष में कोई संघर्ष नहीं है, सभी संघर्ष मोक्ष मार्ग में हैं। मंजिल में विपरीतता नहीं होती, विपरीतताएं तो मार्ग में ही आती हैं। साधक को इन परिस्थितियों से विचलित होने के बजाय अपनी श्रद्धा और आराधना को मजबूत करना चाहिए।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि दूध फीका लगता है तो उसमें शक्कर मिलाकर उसे स्वादिष्ट बनाया जाता है। इसी प्रकार यदि आराधना अच्छी नहीं लग रही है तो उसे छोड़ने के बजाय अपनी श्रद्धा को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए।

योगेश मुनि ने कहा कि किसी व्यक्ति के प्रति गलत धारणा या गलत छवि मन में बना लेना स्वयं के लिए भी परेशानी का कारण बनता है। इसलिए हमारी स्मृति में किसी के प्रति गलत छवि नहीं बननी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिनवाणी आत्महित और आत्मकल्याण के लिए सुननी चाहिए। धर्मसभा में आने का उद्देश्य केवल सुनना नहीं, बल्कि सुनी हुई बातों को जीवन में उतारना होना चाहिए।

मोक्ष मार्ग पर चलने वाले साधक को परिस्थितियों के बीच भी समभाव बनाए रखना चाहिए। जो व्यक्ति मध्यस्थ भाव को धारण करता है, वह राग-द्वेष और मानसिक उलझनों से स्वयं को बचा सकता है।

संघ के अध्यक्ष पंकज मेहता ने कहा कि धर्मसभा में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने संतों के प्रवचनों का लाभ लिया और आत्मचिंतन के माध्यम से जीवन में धर्म के सिद्धांतों को अपनाने का संकल्प लिया। मंत्री अनिल दक ने बताया कि नियमित प्रवचन मन में शांति का प्रकाश फैला रहे हैं।

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