आचार्य विद्यासागर जी के जीवन प्रसंगों से मिली आत्मकल्याण और समाजसेवा की प्रेरणा
कोटा की दादाबाड़ी नसियां जी में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय ब्रह्मचारी संगोष्ठी के प्रथम सत्र में आचार्य विद्यासागर जी महाराज के जीवन प्रसंगों और योगदान पर चर्चा की गई।
कोटा के पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, दादाबाड़ी नसियां जी में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय ब्रह्मचारी संगोष्ठी के दौरान उपस्थित संत, विद्वान और श्रद्धालुगण।
कोटा के पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, दादाबाड़ी नसियां जी में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय ब्रह्मचारी संगोष्ठी के द्वितीय दिवस का प्रथम सत्र रविवार, 11 अक्टूबर 2026 को आध्यात्मिक वातावरण में संपन्न हुआ। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा और भगवान नेमिनाथ जी के ज्ञान कल्याणक के पावन अवसर पर आयोजित इस सत्र में संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज के जीवन प्रसंगों, विराट व्यक्तित्व, आध्यात्मिक साधना तथा विश्व, राष्ट्र और समाज के प्रति उनके अतुलनीय योगदान पर वक्ताओं ने विचार व्यक्त किए। आचार्य श्री के जीवन से जुड़े संस्मरणों के माध्यम से उनके आदर्शों को आत्मसात करने का संदेश दिया गया।
कार्यक्रम का संचालन ब्रह्मचारी श्री सुनील भैया जी, इंदौर ने किया। सत्र का शुभारंभ आचार्य श्री विद्यासागर जी पाठशाला, दादाबाड़ी, कोटा की नन्ही बालिकाओं द्वारा प्रस्तुत मंगलाचरण से हुआ। इसके बाद थांवला परिवार एवं वेद परिवार ने चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन और शास्त्र भेंट के माध्यम से कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ किया।
संगोष्ठी के प्रथम सत्र में ब्रह्मचारी श्री अशोक भैया जी, बनारस (स्याद्वाद महाविद्यालय) ने सबसे पहले सादाबाद महाविद्यालय से जुड़े प्रसंगों और आचार्य श्री के व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों पर अपने विचार प्रस्तुत किए। दूसरे वक्ता ब्रह्मचारी श्री तरुण भैया जी, इंदौर ने आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए सुनीति शतक सहित विभिन्न शतकों के माध्यम से उनके साहित्यिक और आध्यात्मिक चिंतन को रेखांकित किया।
तीसरे वक्ता ब्रह्मचारी श्री देव भैया जी, हीरापुर ने आचार्य श्री के जीवन से जुड़ी घटनाओं का उल्लेख करते हुए उनके आत्मसंयम, तपस्या और कठोर साधना से प्रेरणा लेने का संदेश दिया। चौथे वक्ता ब्रह्मचारी श्री नितिन भैया जी, इंदौर ने आचार्य श्री के विराट व्यक्तित्व और उनके मार्गदर्शन एवं प्रेरणा से स्थापित सर्वोदय, पुण्योदय तथा ज्ञानोदय जैसे तीर्थों और संस्थानों के माध्यम से समाज को मिली दिशा पर अपने विचार रखे।
इसके बाद ब्रह्मचारी श्री अशोक भैया जी, सांगली, महाराष्ट्र ने डोंगरगढ़ प्रवास के दौरान आचार्य श्री की सल्लेखना से जुड़े घटनाक्रमों और संस्मरणों को भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया। ब्रह्मचारी श्री मुकेश भैया जी, इंदौर आश्रम ने भी अपने विचारों के माध्यम से आचार्य श्री के जीवन आदर्शों और आध्यात्मिक योगदान को रेखांकित किया।
सभी वक्ताओं ने अपने संस्मरणों में आचार्य श्री के त्याग, तप, संयम, करुणा, ज्ञान और दूरदर्शिता के साथ राष्ट्र एवं समाज को नई दशा और दिशा देने वाले कार्यों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि आचार्य श्री का जीवन केवल आध्यात्मिक साधना का उदाहरण नहीं, बल्कि आत्मकल्याण के साथ लोककल्याण की भावना को साकार करने वाली प्रेरणा है। उनका जीवन भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों, स्वदेशी भावना, शिक्षा, साहित्य और मानवता के उत्थान के प्रति समर्पण का अनुपम उदाहरण है। उनके जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं में भी गहन आध्यात्मिक संदेश और जीवन को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा निहित है।
सत्र के अंत में निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन दिए। उन्होंने आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज के विराट व्यक्तित्व एवं कृतित्व का भावपूर्ण वर्णन करते हुए उनके जीवन से जुड़े अनेक संस्मरण साझा किए। मुनि श्री ने आचार्य श्री की विलक्षण प्रतिभा, गहन आध्यात्मिकता, कठोर तप-साधना और अनुपम त्यागमय जीवन की विशेषताओं को रेखांकित किया।
मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने जीवन की विभिन्न घटनाओं के माध्यम से आचार्य श्री की दूरदृष्टि, आत्मानुशासन, करुणा और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा को समझने की प्रेरणा दी। उन्होंने आचार्य श्री को विद्या, साधना और श्रमण संस्कृति का अनुपम प्रतीक बताते हुए उनके जीवन आदर्शों को आत्मसात करने की आवश्यकता पर बल दिया। उनके प्रेरक संस्मरणों ने उपस्थित साधकों और श्रोताओं को आचार्य श्री के व्यक्तित्व की गहराई तथा विचारों की व्यापकता से परिचित कराया।
अंतर्राष्ट्रीय ब्रह्मचारी संगोष्ठी का यह सत्र आचार्य श्री के जीवन, दर्शन और प्रेरणादायी कार्यों के स्मरण के साथ ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणाप्रद रहा। संगोष्ठी का मूल उद्देश्य आचार्य श्री के आदर्शों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना, ब्रह्मचर्य एवं आध्यात्मिक साधना का महत्व समझाना और उनके बताए मार्ग पर चलकर आत्मकल्याण तथा समाजकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देना रहा।
धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से पुण्यार्जन किया। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्री राजेंद्र जी, श्रीमती रजनी जी एवं समस्त गोधा परिवार ने किया। कलश स्थापना का पुण्यलाभ भी श्रद्धालु परिवार ने प्राप्त किया।
श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री राजेंद्र जी, श्री हुकम काका एवं श्री प्रकाश हरसोरा परिवार; श्रीमती विमला, श्री धनराज एवं श्री सुरेश जेठानीवाल परिवार; श्री रूप किशोर, श्री सुशील कुमार सिकन्दरा, आगरा तथा श्रीमती सुशीला बाई, श्री अशोक एवं श्री राजकुमार ठोरा परिवार ने किया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्री बोधराज, श्री अशोक एवं श्री राजकुमार दुगेरिया परिवार ने श्रद्धाभाव से किया। श्री सुनील माडिया के अनुसार मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ श्री ओमप्रकाश जी, श्री दीपेश एवं श्री संदीप ठग परिवार को प्राप्त हुआ। वहीं, मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्री कपूर जी एवं श्रीमती मंजू जी धनोप्या परिवार को मिला। मंगलाचरण का पुण्य अवसर हर्षा कोटिया को प्राप्त हुआ।
धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना कर अर्घ्य समर्पित किए और जिनवाणी वंदना के माध्यम से धर्मलाभ अर्जित किया। आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के त्याग, तप, संयम, ज्ञान और करुणा से परिपूर्ण जीवन को स्मरण करते हुए वक्ताओं ने उनके आदर्शों को आचरण में उतारने पर बल दिया। उनके जीवन से जुड़ी प्रेरणाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना और आत्मकल्याण के साथ समाजकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ना संगोष्ठी के संदेश का प्रमुख आधार रहा।