धनतेरस की कथा के प्रसंग को दर्शाती हुई एक प्रतीकात्मक तस्वीर|

आज यानी 6 नवंबर, शुक्रवार के दिन देशभर में धनतेरस का पावन पर्व मनाया जा रहा है। यह उत्सव हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को बहुत उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस खास दिन पर माता लक्ष्मी, कुबेर देवता और भगवान धन्वंतरि की विधि-विधान से पूजा की जाती है। इसके अलावा, घरों में नई वस्तुएं जैसे सोना, चांदी और बर्तन खरीदने की परंपरा है। साथ ही, शाम के समय शुभ मुहूर्त में 'यमदीप' दान किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन धनतेरस की कथा पढ़ने और यमराज के नाम का दीपदान करने से परिवार को अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है। आइए विस्तार से जानते हैं धनतेरस से जुड़ी इस पौराणिक कथा के बारे में।

यमराज और यमदूतों का संवाद

कथा के अनुसार, एक बार भगवान यमराज ने अपने दूतों से एक सवाल पूछा कि क्या कभी ऐसा हुआ है कि जब तुम लोगों ने किसी मनुष्य के प्राण हरे हों और उस समय तुम्हें उस पर दया आ गई हो? यमराज का यह सवाल सुनकर सभी यमदूत संकोच में पड़ गए और उन्होंने हाथ जोड़कर उत्तर दिया कि हे महाराज! हम तो केवल आपकी आज्ञा का पालन करने वाले सेवक हैं, इसलिए हमें कभी भी किसी पर दया नहीं आई।

यमराज ने जब दूतों का यह उत्तर सुना, तो उन्हें ऐसा लगा कि शायद संकोच के कारण वे खुलकर अपनी बात नहीं कह पा रहे हैं। इसलिए यमराज ने उन्हें दोबारा आश्वस्त करते हुए कहा कि किसी भी प्रकार का संकोच मत रखो। यदि तुम्हें कभी किसी जीव या मनुष्य पर दया आई हो, तो उसके बारे में निडर होकर मुझे बताओ।

युवक की अकाल मृत्यु की मर्माहत करने वाली घटना

यमराज के ऐसा कहने पर यमदूत डरते-डरते बोले कि महाराज, एक बार हमारे जीवन में ऐसी घटना घटी थी, जिसे याद करके आज भी हमारा मन पसीज जाता है और हृदय कांप उठता है। दूतों ने विस्तार से बताया कि हंस नाम का एक राजा था, जो एक बार शिकार करने के लिए जंगल में गया था। शिकार के दौरान वह अपने साथियों से बिछड़ गया और भटककर किसी दूसरे राज्य की सीमा में जा पहुंचा।

वहां के राजा हेमा ने उसका बहुत सत्कार किया। इत्तेफाक से उसी दिन राजा हेमा की पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया। जब राजकुंवर का जन्म हुआ, तो ज्योतिषियों ने नक्षत्रों की गणना करके यह भविष्यवाणी की कि इस बालक के विवाह के ठीक चार दिन बाद ही इसकी मृत्यु हो जाएगी। इस भयानक भविष्यवाण से बचने के लिए राजा के आदेशानुसार उस बालक को यमुना तट पर एक गुफा में ब्रह्मचारी के रूप में गुप्त रूप से रखा गया और वहां महिलाओं की परछाई तक को नहीं आने दिया गया।

विधि के विधान और विवाह का प्रसंग

समय अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता गया और विधाता के विधान को कोई नहीं टाल सकता था। एक दिन ऐसा संयोग बना कि राजा हंस की युवा पुत्री घूमते-घूमते यमुना तट पर पहुंच गई। वहां उसकी मुलाकात उस ब्रह्मचारी राजकुमार से हुई और दोनों ने गंधर्व विवाह कर लिया।

जैसे ही विवाह का चौथा दिन आया, नियति के अनुसार राजकुंवर की मृत्यु का समय आ गया। उस नवपरिणीता वधू का विलाप और क्रंदन सुनकर यमदूतों का मन भीतर तक पसीज गया था। वे दोनों वर-वधू रूपी जोड़ी में कामदेव और रति जितने सुंदर दिख रहे थे। ऐसे में उस युवा राजकुमार के प्राण हरते समय यमदूतों का कलेजा कांप उठा था और उनकी आंखों से आंसू नहीं थम रहे थे।

अकाल मृत्यु से बचने का अचूक उपाय

इस घटना को सुनने के बाद यमराज ने कहा कि हम क्या कर सकते हैं? विधि के विधान की मर्यादा और नियमों का पालन करने के लिए हमें यह अप्रिय कार्य करना ही पड़ता है। यह सुनकर एक यमदूत ने साहस जुटाकर यमराज से पूछा कि हे महाराज! क्या संसार में अकाल मृत्यु से बचने का कोई उपाय नहीं है?

इस पर यमराज ने उत्तर दिया कि धनतेरस के दिन विधि-विधान के साथ पूजा करने और दीपदान करने से मनुष्य को अकाल मृत्यु के संकट से छुटकारा मिल जाता है। जिस भी घर में पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ यह पूजन संपन्न होता है, वहां कभी भी अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है।

यमदीप दान की परंपरा की शुरुआत

इसी पौराणिक प्रसंग के बाद से ही धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा के साथ-साथ यमराज के निमित्त दीपदान करने की प्रथा आरंभ हुई। मान्यता है कि इस पावन तिथि पर यमदीप जलाने से यमराज के प्रकोप और अकाल मृत्यु के भय से परिवार की रक्षा होती है तथा घर के सभी सदस्य स्वस्थ और दीर्घायु रहते हैं। इसलिए धनतेरस के दिन घरों की अच्छी तरह साफ-सफाई करके शुद्धता और पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिए।