तस्वीर में दिख रहे युवा वैचारिक टकराव के बीच आस्था और आधुनिक ज्ञान के संतुलन पर विचार करते हुए।

ईसाई धर्म से युवाओं के मोहभंग और आस्था से दूरी बनाने के पीछे धार्मिक मान्यताओं तथा बाहरी दुनिया से मिलने वाली जानकारियों के बीच पैदा होने वाला मानसिक टकराव एक प्रमुख कारण बनकर उभर रहा है। हाल के महीनों में प्रकाशित कई अध्ययनों में इस स्थिति को कॉग्निटिव डिसोनेंस (Cognitive Dissonance) यानी संज्ञानात्मक असंगति से जोड़कर देखा गया है। यह वह मनोवैज्ञानिक तनाव है, जो व्यक्ति की धार्मिक आस्था और उसके विश्वास से बाहर मिलने वाले विचारों, तथ्यों तथा अनुभवों के बीच विरोधाभास पैदा होने पर उत्पन्न होता है।

अध्ययनों के अनुसार, अपने बचपन के ईसाई विश्वास को छोड़ने या उसकी मान्यताओं पर नए सिरे से सवाल उठाने वाले लोगों के लिए यह टकराव एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। हालांकि, विचारों के बीच पैदा होने वाले कुछ विरोधाभास वास्तविक और जायज भी हो सकते हैं, लेकिन उभरते शोध साहित्य से एक दूसरी महत्वपूर्ण बात सामने आ रही है। अनेक ईसाइयों को ऐतिहासिक ईसाई धर्म की एक ऐसी महत्वपूर्ण और सकारात्मक धार्मिक अवधारणा की जानकारी ही नहीं है, जो इस मानसिक तनाव को समझने का रास्ता दिखा सकती है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, जिन धार्मिक मान्यताओं से लोग दूरी बना रहे हैं, उनमें अक्सर हाइपर-फंडामेंटलिज्म यानी अतिवादी कट्टरपंथी सोच का प्रभाव दिखाई देता है। इस विचारधारा में न केवल यह माना जाता है कि ईसाई धर्म ही पूरी तरह सत्य है, बल्कि यह भी मान लिया जाता है कि गैर-ईसाई लोगों के विचार और उनकी मान्यताएं हर विषय में पूरी तरह असत्य हैं। इस तरह की सर्वस्वीकार या सर्वनकार वाली सोच युवाओं के भीतर अनावश्यक मानसिक संघर्ष पैदा करती है। वे एक ओर अपनी ईसाई आस्था को बचाए रखने की कोशिश करते हैं, तो दूसरी ओर बाहरी दुनिया से मिली नई जानकारियों और विचारों को भी स्वीकार करना चाहते हैं। दोनों के बीच संतुलन बनाने की यह कोशिश उनके लिए गहरे मानसिक तनाव का कारण बन सकती है।

इसी मुद्दे पर लेखक और प्रोफेसर डॉ. थैडियस विलियम्स ने ‘ब्रेकपॉइंट’ कार्यक्रम में चर्चा करते हुए ईसाई धर्म छोड़ने के संभावित कारणों में से एक की ओर ध्यान आकर्षित किया है। उनके अनुसार, इस संकट से बचने का एक रास्ता ईसाई समुदाय द्वारा बाइबिल और ऐतिहासिक ईसाई परंपरा की ‘कॉमन ग्रेस’ यानी सार्वभौमिक अनुग्रह की अवधारणा को फिर से समझना है।

कॉमन ग्रेस का अर्थ है कि ईश्वर केवल विश्वासियों को ही अनुग्रह प्रदान नहीं करता, बल्कि गैर-विश्वासियों को भी ऐसी प्रतिभाओं और क्षमताओं से संपन्न करता है, जिनके माध्यम से दुनिया में सत्य, अच्छाई और सुंदरता का विस्तार होता है। बाइबिल में याकूब 1:16 की यह मान्यता इसी अवधारणा का आधार मानी जाती है कि प्रत्येक अच्छी और उत्तम देन ऊपर से आती है।

ईसाई धर्म के प्रमुख धर्मशास्त्री जॉन कैल्विन का मानना था कि ईश्वर गैर-ईसाइयों के मस्तिष्क को भी ज्ञान की चिंगारियों से प्रकाशित कर सकता है। वहीं, अब्राहम काइपर ने कहा था कि विज्ञान का विकास मुख्य रूप से ऐसे लोगों के प्रयासों से हुआ, जो प्रभु के प्रति धार्मिक भय से परिचित नहीं थे, फिर भी विज्ञान ने ज्ञान का ऐसा खजाना तैयार किया, जिसकी ईसाई सराहना करते हैं और कृतज्ञतापूर्वक उसका उपयोग भी करते हैं।

धर्मशास्त्री हरमन बाविंक ने इस विचार को और विस्तार देते हुए कहा था कि कॉमन ग्रेस के कारण ही पतित मनुष्य में आज भी सत्य और अच्छाई दिखाई देती है। अंधकार के बीच प्रकाश अब भी मौजूद है। उनके अनुसार, दर्शनशास्त्र ईश्वर का एक प्रशंसनीय उपहार है। संगीत भी ईश्वर की देन है और कला तथा विज्ञान उपयोगी होने के साथ-साथ अत्यंत मूल्यवान हैं।

कैल्विन, काइपर और बाविंक गैर-ईसाइयों के ज्ञान और उपलब्धियों की सराहना करके ईसाई विश्वदृष्टि से समझौता नहीं कर रहे थे। वे बाइबिल में मौजूद उस परंपरा को आगे बढ़ा रहे थे, जिसमें ईश्वर के अनुग्रह को केवल धार्मिक विश्वासियों तक सीमित नहीं माना गया है।

बाइबिल में इसका उदाहरण कैन के प्रसंग में भी मिलता है। अपने भाई की हत्या के बाद ईश्वर ने कैन को शाप दिया था, लेकिन इसके बावजूद उसे विवाह और संतान का सुख मिला। इतना ही नहीं, बाइबिल में दर्ज पहले शहर के निर्माण के लिए आवश्यक नागरिक इंजीनियरिंग संबंधी ज्ञान और वास्तुशिल्प कौशल भी कैन को प्राप्त हुआ। उत्पत्ति 4:17 के अनुसार, कैन ने पहला शहर बसाया। उसके वंशजों को खेती, संगीत और धातु के काम में भी विशेष कौशल प्राप्त हुआ। इसे कॉमन ग्रेस की अवधारणा के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

बाविंक ने इस संदर्भ में मूसा, इस्राएलियों, सुलैमान और दानिय्येल के उदाहरण भी दिए थे। उन्होंने बताया था कि मूसा का पालन-पोषण मिस्र के समस्त ज्ञान के बीच हुआ। इस्राएलियों ने प्रभु के भवन को सजाने के लिए मिस्र का सोना और चांदी इस्तेमाल किया। सुलैमान ने मंदिर निर्माण के लिए हीराम की सेवाएं लीं और दानिय्येल को कसदियों के विज्ञान का प्रशिक्षण दिया गया। ये उदाहरण बताते हैं कि धार्मिक परंपरा से बाहर प्राप्त ज्ञान और कौशल को भी उपयोगी माना गया है।

नए नियम में भी इस विचार का उदाहरण मिलता है। प्रेरित पौलुस एथेंस की मार्स हिल नामक चट्टानी पहाड़ियों पर पहुंचे थे, जहां गैर-ईसाई दार्शनिक जीवन के अर्थ और अस्तित्व से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श करते थे। वहां पौलुस ने उन्हीं दार्शनिकों के कवियों की रचनाओं का उल्लेख किया। अराटस ने कहा था, ‘हम ईश्वर की संतान हैं’, जबकि एपिमेनिडीज ने कहा था, ‘हम उसी में जीते हैं, चलते हैं और हमारा अस्तित्व है।’

पौलुस ने इन गैर-ईसाई विचारकों के कथनों का इस्तेमाल उन्हें विधर्मी या नास्तिक साबित करने के लिए नहीं किया, बल्कि उनके विचारों में मौजूद ईश्वर और मानवीय अस्तित्व से संबंधित सार्थक तथ्यों को स्वीकार किया। यह उदाहरण दर्शाता है कि धार्मिक आस्था बनाए रखते हुए भी दूसरे विचारों में मौजूद सत्य को पहचाना जा सकता है।

जॉन कैल्विन ने इसी सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए कहा था कि समस्त सत्य ईश्वर की ओर से आता है। हरमन बाविंक ने भी इस विचार का समर्थन करते हुए कहा था कि ईसा मसीह से बाहर के लोगों में दिखाई देने वाले सत्य, अच्छाई और सुंदरता को नकारना उचित नहीं होगा। उनके अनुसार, ये आत्मा के उपहार हैं और इन्हें अस्वीकार करना या तुच्छ समझना स्वयं ईश्वर का अपमान करने जैसा है।

हालांकि, कॉमन ग्रेस की अवधारणा का अर्थ बाइबिल के विवेक और धार्मिक सिद्धांतों को छोड़ देना नहीं है। सत्य, अच्छाई और सुंदरता को स्वीकार करने का मतलब गैर-ईसाई दुनिया में मौजूद असत्य, अनैतिकता और कुरूपता का समर्थन करना भी नहीं है। इसके लिए विवेकपूर्ण दृष्टिकोण आवश्यक है। साथ ही, हर गैर-ईसाई विचार को पूरी तरह गलत मान लेने वाली समूहवादी और अतिवादी सोच से भी बचना जरूरी है।

धार्मिक विचारकों के अनुसार, युवाओं के बीच ईसाई धर्म से बढ़ती दूरी का एक कारण ऐसी धार्मिक शिक्षा भी हो सकती है, जिसमें बाइबिल की गहराई और ईश्वर के अनुग्रह की व्यापकता को पर्याप्त रूप से नहीं समझाया गया। जब युवाओं को यह सिखाया जाता है कि सत्य केवल उनके अपने धार्मिक दायरे में मौजूद है, तो बाहरी दुनिया से मिलने वाला ज्ञान और अनुभव उनकी आस्था के सामने चुनौती बनकर खड़ा हो सकता है।

कैल्विन ने इसी संदर्भ में कहा था कि यदि हम ईश्वर की आत्मा को सत्य का एकमात्र आधार मानते हैं, तो जहां कहीं भी सत्य दिखाई दे, हमें उसका तिरस्कार नहीं करना चाहिए। सत्य जहां भी मौजूद हो, उसे पहचानने और स्वीकार करने की यह अवधारणा हाइपर-फंडामेंटलिस्ट सोच तथा उससे पैदा होने वाले अनावश्यक मानसिक संघर्ष का एक अलग धार्मिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।