भीलवाड़ा: राष्ट्र संत पुलकसागरजी ने बताए मोक्ष और धर्म साधना के मायने
शास्त्रीनगर में आयोजित चातुर्मासिक प्रवचन में मुनि पुलकसागर ने आत्मा, शरीर और तीर्थंकर दर्शन के महत्व पर विचार रखे। 16 सितंबर से पर्युषण साधना शिविर शुरू होगा।
तस्वीर में माथे पर तिलक लगाए एक व्यक्ति मंच पर बैठे नजर आ रहे हैं।
भीलवाड़ा में पहली बार चातुर्मास कर रहे राष्ट्र संत मनोज्ञाचार्य पुलकसागरजी महाराज ने शुक्रवार को शास्त्रीनगर स्थित सूर्यमहल में चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान मोक्ष, आत्मा, शरीर और धर्म साधना के महत्व पर विचार व्यक्त किए। श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट, मैन सेक्टर शास्त्रीनगर के तत्वावधान में सकल दिगम्बर जैन समाज की ओर से आयोजित प्रवचन में आचार्यश्री ने कहा कि वे मोक्ष की साधना कर रहे हैं, लेकिन उसका फल कब मिलेगा, यह ज्ञात नहीं है।
आचार्य पुलकसागर महाराज ने कहा, “मेरे मन की एक ही प्रार्थना है कि विदेह क्षेत्र में जन्म हो और अपनी आंखों से एक बार सीमन्धर भगवान एवं तीर्थंकर के दर्शन कर सकूं। एक बार जीवित तीर्थंकर को देखना चाहता हूं, इसके अलावा मेरे जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है।” उन्होंने कहा कि इस पंचम काल में कोई भी तीर्थंकर जैसा नहीं हो सकता। जिस दिन उनकी कृपा हो जाएगी और दृष्टि पड़ जाएगी, मोक्ष के द्वार खुल जाएंगे।
आचार्यश्री ने कहा कि आत्मा के लिए मानव देह किराए का मकान है, जिसे एक दिन खाली करना ही पड़ेगा। कोई कितना भी शक्तिशाली और बलशाली हो, उसे देह का त्याग करना ही पड़ेगा। जब तक शरीर में बल रहता है, आत्मा रहती है और बलहीन व निर्बल होते ही आत्मा शरीर बदल लेती है। उन्होंने कहा कि आत्मा शरीर के बल पर ही योग या भोग करती है। निर्बल होने पर न तो भोग में मन लगता है और न ही तपस्या-साधना कर सकते हैं। शरीर में शक्ति होने पर ही योग या भोग संभव है। इसलिए जब तक शरीर आत्मा का साथ दे रहा है, अधिकाधिक धर्म साधना कर लेनी चाहिए, फिर अवसर नहीं मिल पाएगा।
आचार्य पुलकसागर महाराज ने कहा कि इस युग में शुद्धोपयोगी मुनि नहीं हो सकते, लेकिन शुभोपयोगी मुनि श्रावक से हर दृष्टि से श्रेष्ठ हैं। ऐसे मुनि शुभ ध्यान करते हैं, लेकिन उनकी सहनन वज्र जैसी नहीं होती। ऐसे मुनि आपको एवं आपके बच्चों को संस्कार प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि स्वाध्याय वह होता है जो हमें देव, शास्त्र एवं गुरु से जोड़ता है। जो हमारी आस्था को तोड़ता हो, वह स्वाध्याय नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि शुभोपयोगी मुनि बनने का अधिकार भगवान महावीर देते हैं। ऐसे मुनि प्रतिदिन एक बार भोजन, दो बार प्रतिक्रमण, तीन बार सामायिक एवं चार बार स्वाध्याय करते हैं। विनम्रता साधुता की पहचान होती है। उन्होंने कहा कि मुनि का फर्ज होता है कि श्रावक का मन नहीं बिगड़े और श्रावक का फर्ज होता है कि मुनि का तन नहीं बिगड़े। “तुम मेरे तन का और मैं तुम्हारे मन का ध्यान रखूंगा, क्योंकि मुनि तन की और श्रावक मन की परवाह नहीं करते हैं।”
श्री पुलकसागर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष प्रवीण चौधरी ने बताया कि आचार्य पुलकसागर महाराज के सानिध्य में पर्युषण (दशलक्षण) पर्व की साधना 16 से 25 सितम्बर तक सूर्यमहल में होगी। इस अवधि में आयोजित होने वाले दस दिवसीय पाप नाशनम शिविर के लिए अब तक सैकड़ों श्रावक-श्राविकाएं पंजीयन करा चुके हैं।
प्रवचन के शुरू में दीप प्रज्वलन, पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट का सौभाग्य सीकर निवासी हीरालाल आदित्य जीविक रारा परिवार ने प्राप्त किया। चातुर्मास समिति के संयोजक मनीष शाह एवं सह संयोजक लोकेश अजमेरा ने अतिथियों का स्वागत किया। संचालन चातुर्मास समिति के महामंत्री जयकुमार पाटनी ने किया।
प्रतिदिन चातुर्मासिक प्रवचन सुबह 8.30 से 10 बजे तक सूर्यमहल में हो रहे हैं। शाम 7 से 8 बजे तक आनंद यात्रा एवं आरती का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें शहर के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु शामिल होकर लाभ प्राप्त कर रहे हैं।