बिहार के कई इलाकों में बाढ़ ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। कहीं घर पानी में डूबे हैं, कहीं सड़कें गायब हैं तो कहीं लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए नाव का सहारा लेना पड़ रहा है। देश जहां विकास, तकनीक और आधुनिकता की नई ऊंचाइयों को छूने का दावा कर रहा है, वहीं बारिश और बाढ़ से जूझता आम आदमी विकास की दूसरी तस्वीर सामने रख रहा है।

चांद तक पहुंचने से लेकर डिजिटल क्रांति और विश्वगुरु बनने की महत्वाकांक्षा तक भारत की उपलब्धियों की चर्चा दुनिया भर में हो रही है। लेकिन इसी चमकती तस्वीर के दूसरी तरफ देश के कई हिस्सों में बारिश और बाढ़ की मार झेलता आम नागरिक दिखाई देता है।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ को स्वच्छ वायु और बेहतर पर्यावरणीय प्रदर्शन के लिए सम्मान मिलना निश्चित रूप से गर्व की बात है। लेकिन इसी लखनऊ का फैजुल्लागंज इलाका बारिश के दौरान जलभराव और बाढ़ जैसे हालात से जूझता नजर आए तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि विकास की असली तस्वीर कौन-सी है।

एक तरफ रिपोर्टों में शहरों की रैंकिंग सुधरती है, दूसरी तरफ बारिश होते ही सड़कें जलमग्न हो जाती हैं। लोगों के घरों और दुकानों में पानी घुस जाता है और आवागमन तक मुश्किल हो जाता है।

सवाल सिर्फ बारिश का नहीं, व्यवस्था का भी है। हर साल बारिश आती है। हर साल जलभराव होता है। हर साल प्रशासनिक स्तर पर व्यवस्थाओं और स्थायी समाधान के दावे किए जाते हैं। फिर कुछ समय बाद वही समस्या दोबारा सामने खड़ी दिखाई देती है।

आखिर इसकी जिम्मेदारी किसकी है? क्या सिर्फ प्रकृति को दोष देकर व्यवस्था अपनी जिम्मेदारी से बच सकती है? या फिर उन व्यवस्थाओं पर भी सवाल होना चाहिए, जो बरसात से पहले नालों की सफाई, जलनिकासी और बाढ़ नियंत्रण की तैयारियों के बड़े-बड़े दावे करती हैं?

जनता की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। चुनाव के समय जाति, धर्म, क्षेत्र, बिरादरी और भावनात्मक मुद्दों को प्राथमिकता दी जाती है। लेकिन सड़क, नाली, जलनिकासी, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे बुनियादी सवाल कई बार पीछे छूट जाते हैं।

विकास का मूल्यांकन सिर्फ बड़े प्रोजेक्टों और शिलान्यासों से नहीं, बल्कि आम आदमी की जिंदगी से होना चाहिए। अगर हम अंतरिक्ष में पहुंचने की क्षमता रखते हैं, आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं और दुनिया में अपनी पहचान मजबूत कर रहे हैं, तो फिर हर वर्ष बाढ़ और शहरी जलभराव से जूझते लोगों को स्थायी राहत क्यों नहीं मिलनी चाहिए?

चांद पर पहुंचने की उपलब्धि अपनी जगह है, लेकिन धरती पर एक गरीब परिवार का घर सुरक्षित रहना भी उतनी ही बड़ी उपलब्धि होनी चाहिए।

स्वच्छ हवा की रैंकिंग में शहर नंबर-1 हो सकता है, लेकिन बारिश में वही शहर पानी में डूब जाए तो विकास के मॉडल पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

कागजों पर योजनाएं बनती हैं, करोड़ों रुपये के प्रोजेक्ट स्वीकृत होते हैं, शिलान्यास होते हैं और विकास के दावे किए जाते हैं। मगर जब पहली तेज बारिश में सड़कें टूटने लगें, गड्ढे जानलेवा बन जाएं, नालियां उफनने लगें और घरों में पानी भर जाए तो आम आदमी पूछता है—आखिर वह विकास गया कहां?

बिहार की बाढ़ हो या उत्तर प्रदेश के शहरों का जलभराव, इसे केवल प्राकृतिक आपदा मानकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि बाढ़ और जलभराव के प्रभाव को कम करने के लिए व्यवस्थाएं कितनी तैयार हैं।

देश की असली तरक्की तब होगी, जब किसान की फसल सुरक्षित होगी, गरीब का घर बाढ़ से बचेगा, शहर की सड़कें तालाब नहीं बनेंगी और आम नागरिक को हर बारिश में अपनी जिंदगी और संपत्ति की चिंता नहीं करनी पड़ेगी।

चांद पर घर बनाने का सपना जरूर देखिए, विश्वगुरु बनने का लक्ष्य भी रखिए, लेकिन जमीन पर बसे उन घरों को मत भूलिए, जो हर बरसात में पानी में डूब जाते हैं।

हजारों करोड़ रुपये के विकास कार्यों के शिलान्यास भी जरूरी हैं, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है कि वे सड़कें टिकें, पुल सुरक्षित रहें, नालियां काम करें और योजनाओं का लाभ जमीन पर दिखाई दे।

क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना जनता का अधिकार है। और जब तक इन सवालों के संतोषजनक जवाब नहीं मिलते, सवाल पूछे जाते रहने चाहिए और सवाल जिंदा रहने चाहिए।

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