श्रीगंगानगर में सामान्य वर्ग की अनदेखी पर बढ़ा आक्रोश, सोशल मीडिया तक सीमित विरोध
श्रीगंगानगर में सामान्य वर्ग की अनदेखी को लेकर सोशल मीडिया पर आक्रोश बढ़ रहा है। चुनावी दावेदारों और टिकट वितरण पर सवाल उठ रहे हैं।
श्रीगंगानगर में निकाय चुनाव को लेकर उम्मीदवारों की दावेदारी और सामान्य वर्ग की अनदेखी का मुद्दा चर्चा में है। शहर में कई ऐसे उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं, जो स्वयं को सबसे बड़ा ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ, शहर का हितैषी और जन-जन का सेवक साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके बावजूद जनता के बीच उनके वास्तविक व्यक्तित्व और दावों को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
हालात यह हैं कि श्रीगंगानगर की जनता उम्मीदवारों के बारे में बहुत कुछ जानती है, लेकिन उसके पास कोई स्पष्ट विकल्प नहीं है। जनता “अच्छा जन प्रतिनिधि, सच्चा जन प्रतिनिधि” की बातें तो करती है, लेकिन उन्हें चुनती नहीं। इसी कारण ऐसे व्यक्ति भी चुनाव मैदान में दिखाई दे रहे हैं, जिनके बारे में बताए जा रहे दावों और उनके वास्तविक सच में अंतर होने की चर्चा है।
श्रीगंगानगर की जनता जिन-जिन उम्मीदवारों को सभापति का दावेदार मान रही है, उनके व्यक्तित्व को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कोई भी व्यक्ति आदर्श व्यक्तित्व नहीं हो सकता, लेकिन जो चेहरे सामने हैं, उनमें किसके कितने छेद हैं और कितने भेद हैं, यह कोई छिपा हुआ सच नहीं है। इसके पीछे यह सवाल भी उठ रहा है कि जिम्मेदारों को जनता की भावनाओं से आखिर कितना सरोकार है। सत्ता का स्वभाव अब जिद्दी हो चुका है।
सबसे बड़ा सवाल सामान्य वार्डों में ओबीसी उम्मीदवारों की मौजूदगी को लेकर उठाया जा रहा है। इसके पक्ष में तर्क दिया जा रहा है कि ये उम्मीदवार पहले से तैयारी कर रहे थे और ओबीसी भी सामान्य वर्ग के समान ही है। सवाल यह है कि यदि ऐसा है तो फिर आरक्षण किस बात का है?
इस विषय पर यह भी सवाल उठाया जा रहा है कि सामान्य वर्ग का उम्मीदवार आरक्षण स्पष्ट होने के बाद ही चुनाव की तैयारी करेगा। वह वार्ड में तभी आएगा, जब आरक्षण की लॉटरी का काम पूरा हो जाएगा। जबकि अन्य उम्मीदवारों को इस विषय पर पहले से सोचने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसी स्थिति को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि आखिर सभी भूमि गोपाल की क्यों मानी जा रही है।
आरक्षित वार्ड भी उनका और सामान्य वार्ड भी उनका—इसी स्थिति को लेकर जनता में आक्रोश है। हालांकि यह आक्रोश फिलहाल सोशल मीडिया तक सीमित है। बीजेपी-कांग्रेस के कई ऐसे नेता भी इस विषय पर मुखर हैं, जिन्हें टिकट नहीं मिली। लेकिन उनमें इतना हौसला नहीं है कि वे सड़क पर उतरकर अपना आक्रोश व्यक्त करें और अपनी-अपनी पार्टियों के नेताओं से सवाल कर सकें।
फिलहाल यह मुद्दा चर्चा तक सीमित है, लेकिन यदि बीजेपी-कांग्रेस इसी प्रकार सामान्य वर्ग की उपेक्षा करते हुए जिसे चाहे उम्मीदवार के रूप में थोपती रहीं, तो यह आक्रोश सड़कों पर भी दिखाई देने की स्थिति बन सकती है।
हैरानी की बात यह भी है कि बीजेपी ने भी ऐसा ही किया। जिस पार्टी की रीढ़ सामान्य वर्ग को माना जाता है और जिसे सबसे अधिक तन-मन-धन सामान्य वर्ग से मिलता है, वही पार्टी उसी वर्ग के अधिकारों को किसी दूसरे को दे रही है और बिना किसी भय के दे रही है।
अब सामान्य वर्ग के सामने यह सवाल है कि इस वक्त उसे क्या निर्णय करना है। निर्णय उसे स्वयं करना है और निर्णय सुनाने के लिए उसके पास मतदान का अधिकार है। वह भी गुप्त मतदान। सामान्य वर्ग को स्वीकार करना है या अस्वीकार करना है, इसका निर्णय उसी के हाथ में है। वार्ड उसका है और निर्णय भी उसका ही होगा।