राजस्थान के निकाय चुनाव में बोर्ड गठन के दौर ने भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी रणनीति तथा पार्षदों के समर्थन के गणित को सामने ला दिया है। 10 नगर निगमों में अब तक भाजपा छह में महापौर पद हासिल कर चुकी है, जबकि कांग्रेस को एक नगर निगम में सफलता मिली है। जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगमों के महापौर चुनाव 25 सितंबर को होने हैं।

चुनावी समीकरणों में भाजपा ने बहुमत वाले निकायों के साथ-साथ उन जगहों पर भी रणनीतिक प्रयास किए, जहां किसी एक दल के पास स्पष्ट बहुमत नहीं था। निर्दलीय पार्षदों के समर्थन और दलों के बीच बने समीकरणों ने कई निकायों में बोर्ड गठन की तस्वीर बदली। चुनाव के बाद विभिन्न स्थानों पर पार्षदों की बाड़ेबंदी भी हुई और दोनों प्रमुख दलों ने अपने-अपने पार्षदों को एकजुट रखने के प्रयास किए।

राज्य में कुल 309 नगर निकाय हैं। 14 सितंबर को पार्षदों के चुनाव परिणाम घोषित हुए थे। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भाजपा ने 4,182, कांग्रेस ने 3,619 और निर्दलीयों ने 2,273 वार्डों में जीत दर्ज की। 305 निकायों में महापौर, सभापति और अध्यक्ष पद के चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ी, जबकि जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगम तथा सुकेत नगरपालिका के शीर्ष पदों का चुनाव 25 सितंबर को निर्धारित किया गया है।

इस चुनाव में कई निकायों में बोर्ड गठन का गणित सीधे पार्षदों की संख्या से तय नहीं हुआ। 309 निकायों में 143 ऐसे बताए गए, जहां किसी एक दल के पास स्पष्ट बहुमत नहीं था। ऐसे निकायों में निर्दलीय पार्षदों की भूमिका निर्णायक बनी।

नगर निगमों के स्तर पर भी यही तस्वीर दिखाई दी। भाजपा ने भीलवाड़ा और भरतपुर में निर्विरोध महापौर पद हासिल किया, जबकि अजमेर, अलवर, पाली और उदयपुर में मतदान के जरिए जीत दर्ज की। कांग्रेस को बीकानेर में महापौर पद मिला। इस तरह उपलब्ध परिणामों में भाजपा के खाते में छह और कांग्रेस के खाते में एक महापौर पद आया है, जबकि जयपुर, जोधपुर और कोटा में फैसला 25 सितंबर को होगा।

पाली नगर निगम इसका प्रमुख उदाहरण रहा। यहां कांग्रेस ने 65 में से 29 वार्ड जीते, भाजपा को 21 और निर्दलीयों को 15 वार्डों में जीत मिली। वार्डों में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी रही, लेकिन महापौर पद के चुनाव में भाजपा की नमिता बुबकिया विजयी रहीं। उपलब्ध परिणामों के अनुसार पाली में बोर्ड गठन का समीकरण वार्डों में मिली सीटों और महापौर चुनाव के मतदान के बीच अंतर को स्पष्ट करता है।

राजस्थान के 309 निकायों में पार्षद चुनाव के बाद सामने आए आंकड़े यह भी दिखाते हैं कि लगभग समान मत हिस्सेदारी के बावजूद दोनों प्रमुख दलों के वार्ड परिणामों में अंतर रहा। इस अंतर ने कई निकायों में बोर्ड गठन के लिए रणनीतिक समर्थन और निर्दलीय पार्षदों की भूमिका को महत्वपूर्ण बनाया।

निकाय चुनाव के इस चरण में भाजपा की ओर से अनुशासन, पार्षदों को एकजुट रखने की रणनीति और बहुमत से कम संख्या वाले निकायों में समर्थन जुटाने के प्रयास चर्चा में रहे। दूसरी ओर, कांग्रेस के लिए पाली जैसे परिणाम यह दिखाते हैं कि अधिक वार्ड जीतने के बावजूद महापौर चुनाव में बहुमत का समीकरण अलग हो सकता है। निकाय चुनाव के मौजूदा परिणामों ने राजस्थान की शहरी राजनीति में सीटों, निर्दलीय पार्षदों और बोर्ड गठन के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से सामने रखा है।

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