मुनि योगसागर: त्याग और संयम से ही संभव आत्मकल्याण
कोटा के श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में चल रहे विधान के तीसरे दिन मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने धर्म, व्रत और आत्मचिंतन का महत्व बताया।
कोटा के पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में मुनि योगसागर जी महाराज का प्रवचन।
कोटा में श्री कल्पद्रुम महामंडल विधान के तृतीय दिवस निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने धर्म, त्याग, व्रत, संयम और आत्मकल्याण का महत्व बताते हुए कहा कि आत्मा के शुद्ध स्वभाव की प्राप्ति त्याग के माध्यम से ही संभव है। बाहरी वस्तुओं के प्रति ममता और आसक्ति छोड़कर आत्मचिंतन की ओर बढ़ना ही सच्ची धर्मसाधना है। उन्होंने श्रद्धालुओं को संग्रह की प्रवृत्ति छोड़ने, इच्छाओं पर नियंत्रण रखने और व्रतों का दृढ़ता से पालन करने की प्रेरणा दी।
श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी, कोटा में आयोजित विधान के दौरान मुनि श्री ने कहा कि जीव में अनादिकाल से ग्रहण करने और संग्रह करने की प्रवृत्ति रही है, जबकि आत्मकल्याण का मार्ग त्याग से प्रशस्त होता है। मनुष्य को निरंतर चिंतन करना चाहिए कि वह शुद्ध आत्मतत्त्व है, बाहरी वस्तुओं से उसका वास्तविक संबंध क्या है और वह दूसरों की परिस्थितियों एवं व्यवहार से अनावश्यक रूप से प्रभावित क्यों हो।
उन्होंने बताया कि विषय-भोगों की क्षणभंगुरता को समझने पर ही उनके प्रति वैराग्य का भाव जागृत होता है। जब व्यक्ति बाहरी पदार्थों को स्थायी सुख का साधन मानना छोड़ देता है, तब उसका ध्यान आत्मिक शांति और आत्मस्वरूप की ओर केंद्रित होने लगता है। ममता, आसक्ति और परिग्रह का त्याग जीवन में संतोष, समता और शुद्ध भावों के विकास का आधार बनता है।
व्रतों में दृढ़ता को बताया आत्मसंयम की पहचान
मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि व्रत ग्रहण करने के बाद उनमें दृढ़ता बनाए रखना आवश्यक है। मन की चंचलता और इच्छाओं की अधिकता के कारण व्रतों के पालन में शिथिलता आ सकती है। इसलिए प्रत्येक श्रावक को अपनी सामर्थ्य के अनुसार नियम निर्धारित करके उनका निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
शिक्षा व्रतों का महत्व बताते हुए उन्होंने कहा कि ये व्रत आत्मसंयम, त्याग और मुनि जीवन की प्रेरणा देते हैं। इनके माध्यम से व्यक्ति अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करना, जीवन को अनुशासित बनाना और सभी जीवों के प्रति समभाव रखना सीखता है। व्रतों की सार्थकता केवल उन्हें ग्रहण करने में नहीं, बल्कि उनके अनुरूप जीवन जीने में है।
स्वाध्याय, ध्यान और तप से कर्मनिर्जरा का मार्ग
मुनि श्री ने स्वाध्याय, ध्यान, तप और दान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भगवान की वाणी एवं जिनागम का अध्ययन करके उनकी शिक्षाओं को आचरण में उतारना ही सच्चा स्वाध्याय है। धर्मग्रंथों का ज्ञान तभी सार्थक होता है, जब उससे मनुष्य के विचारों और व्यवहार में परिवर्तन आए।
उन्होंने कहा कि तप और आत्मचिंतन से कर्मनिर्जरा का मार्ग प्रशस्त होता है। व्यक्ति को अपनी प्रवृत्तियों का निरीक्षण करते हुए समझना चाहिए कि कौन-से भाव उसे आत्मकल्याण से दूर ले जा रहे हैं। ममता, आसक्ति और परिग्रह को कम करने का प्रयास करने से आत्मिक शांति, संतोष और समता के भाव विकसित होते हैं।
प्रवचन में मुनि श्री ने पापों की निर्जरा के महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने पापों का परिमाण निर्धारित करके उन्हें सीमित करने का प्रयास करना चाहिए। केवल पुण्य की कामना करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अशुभ भावों और कर्मबंध के कारणों को पहचानकर उनसे मुक्त होने की भावना भी आवश्यक है।
त्याग, संयम, स्वाध्याय और आत्मचिंतन को जीवन में अपनाकर ही आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ा जा सकता है। इच्छाओं को नियंत्रित करने, व्रतों में दृढ़ रहने और आत्मा के शुद्ध स्वरूप का चिंतन करने से साधना वास्तविक अर्थों में फलवती होती है। मुनि श्री की देशना ने श्रद्धालुओं को बाहरी संग्रह के बजाय आंतरिक गुणों की वृद्धि करने और आत्मशुद्धि के लिए निरंतर पुरुषार्थ करने की प्रेरणा दी।
हुकम काका के जन्मदिन पर हरसोरा परिवार ने किया महाआरती का पुण्यार्जन
इस मांगलिक अवसर पर हुकम काका का जन्मदिन मनाया गया। चक्रवर्ती बन हरसोरा परिवार के पदम, राजेंद्र, हुकम काका, प्रकाश एवं प्रतीक हरसोरा ने महाआरती का पुण्यार्जन किया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने मंगलभाव के साथ शुभकामनाएं व्यक्त कीं और धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता की।
विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने अर्जित किया पुण्यलाभ
श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में आयोजित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक पुण्यार्जन किया। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यलाभ छोटूलाल, प्रेमलता एवं दीपक धनोत्या परिवार ने प्राप्त किया। कलश स्थापना का पुण्यलाभ कैलाश चंद एवं लाड बाई ठग परिवार ने अर्जित किया।
श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन अनिल, मोहित एवं रोहित, गाजियाबाद; छोटूलाल, प्रेमलता एवं दीपक, बड़ा नयागांव वाले; तथा श्रीमती सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार ने किया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक सहभागिता कर पुण्यार्जन किया। श्री सुनील माडिया के अनुसार, मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ अजय कुमार जैन किरण जैन परिवार को प्राप्त हुआ, जबकि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य मुकेश जैन दोराया को मिला। मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी श्रद्धालु ने प्राप्त किया।
धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना की, अर्घ्य समर्पित किए और जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
मुनि श्री योगसागर जी महाराज के प्रवचन का केंद्रीय संदेश यही रहा कि विषय-भोगों से विरक्ति, ममता और परिग्रह का त्याग तथा व्रत, संयम, स्वाध्याय और तप का पालन आत्मिक शांति की दिशा में महत्वपूर्ण हैं। पुण्य की कामना के साथ अशुभ भावों और कर्मबंध के कारणों को पहचानकर उनसे मुक्त होने का पुरुषार्थ करना ही आत्मा की निर्मलता की ओर बढ़ने का मार्ग है।