कोटा में हुआ इको-फ्रेंडली रावण दहन, नहीं चलाए गए पटाखे
वैदिक रीति-रिवाज से 15 फीट ऊंचे पुतले का हुआ अंतिम संस्कार, गोबर के उपले और देसी घी का हुआ इस्तेमाल
कोटा में वैदिक रीति-रिवाज से रावण दहन का आयोजन किया गया।
कोटा में सर्व हिंदू समाज सोशल क्रांतिकारी महासंघ ने पर्यावरण संरक्षण और सनातन परंपराओं का संदेश देते हुए इको-फ्रेंडली रावण दहन का आयोजन किया। ‘पर्यावरण संरक्षण प्रहरी कोटा’ मुहिम के तृतीय चरण के तहत स्थापित ‘इको फ्रेंडली रावण दहन क्लब’ की ओर से 20 अक्टूबर को गुरुधाम कॉलोनी, रोटेदा रोड, कोटा जंक्शन पर 15 फीट ऊंचे रावण के पुतले का वैदिक रीति-रिवाज से अंत्येष्टि रूपी संस्कार किया गया। इस आयोजन में पुतले के भीतर बारूदी पटाखों और आतिशबाजी का इस्तेमाल नहीं किया गया, बल्कि प्राकृतिक और सुगंधित द्रव्यों से दहन की प्रक्रिया पूरी की गई।
महासंघ के मुख्य संयोजक एवं अध्यक्ष गोविंद नारायण अग्रवाल के संयोजन में कर्मकांडी प्रकांड पंडितों ने मंत्रोच्चार के साथ वैदिक दहन प्रक्रिया संपन्न कराई। इसके लिए 500 गोबर के उपले, एक पीपा शुद्ध देसी घी, 108 नारियल, 11 किलोग्राम हवन सामग्री, 11 किलोग्राम चंदन की लकड़ी, 2 किलोग्राम कपूर, 2 किलोग्राम अगर-तगर और 1 किलोग्राम गूगल का उपयोग किया गया। आयोजन में पुतले को पटाखों से उड़ाने के बजाय सुगंधित द्रव्यों के माध्यम से दहन करने की परंपरा अपनाई गई।
महासंघ के संस्थापक महामंत्री एवं प्रवक्ता राजाराम जैन ‘कर्मयोगी’ (रावण सरकार) ने पौराणिक मान्यताओं का उल्लेख करते हुए बताया कि वाल्मीकि रामायण के अनुसार, रावण वध के बाद भगवान श्रीराम ने शोकसंतप्त विभीषण को समझाया था कि प्राण निकलने के साथ ही व्यक्ति के प्रति सभी वैर समाप्त हो जाते हैं। मृत शरीर के प्रति द्वेष रखने के बजाय उसका सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार करना भाई का नैतिक कर्तव्य है।
अध्यक्ष गोविंद नारायण अग्रवाल ने कहा कि पुतले के भीतर पटाखे भरकर धमाके करना और मृत शरीर के प्रतीक के चिथड़े उड़ाना सनातन धर्म के नियमों के विरुद्ध है। उन्होंने स्पष्ट किया कि खुशी व्यक्त करने के लिए प्रतीकात्मक आतिशबाजी अलग से की जा सकती है, लेकिन रावण के पुतले का दहन मर्यादा के साथ और सुगंधित द्रव्यों का उपयोग करते हुए किया जाना चाहिए।
रावण दहन से पहले ‘राम कला संस्थान’ के निदेशक दीपक शर्मा और उनके कलाकारों ने प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण, हनुमान, अंगद एवं जामवंत की लीलाओं के साथ रावण वध का जीवंत मंचन किया। इसके बाद पुतला दहन से पहले वानर सेना द्वारा समुद्र सेतु निर्माण में पत्थरों के योगदान को स्मरण और नमन करने के उद्देश्य से रावण के पुतले को कंकड़ मारने की पौराणिक परंपरा भी निभाई गई।
इको फ्रेंडली रावण दहन क्लब के मुख्य संरक्षक डॉ. एमएल अग्रवाल ने बताया कि नई पीढ़ी में पर्यावरण-अनुकूल तरीके से त्योहार मनाने के संस्कार विकसित करने के उद्देश्य से 7 फीट ऊंचे 10 इको-फ्रेंडली रावण के पुतले निशुल्क वितरित किए गए थे। शहर के विभिन्न क्षेत्रों में इन पुतलों का इसी रीति से दहन किया गया।
गुरुधाम शाखा अध्यक्ष अनिल कुमार शर्मा एवं नीलम शर्मा के नेतृत्व में आयोजित कार्यक्रम में विशाल जनसमुदाय की उपस्थिति रही। इको-फ्रेंडली रावण दहन की इस पहल के माध्यम से महासंघ ने पर्यावरण संरक्षण के साथ वैदिक परंपराओं और मर्यादापूर्ण अंतिम संस्कार के संदेश को आयोजन के केंद्र में रखा।