आत्मकल्याण के लिए व्रत और भावों की निर्मलता जरूरी, मुनि योगसागर जी ने समझाया धर्म का वास्तविक अर्थ
कोटा के नसियां जी में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय ब्रह्मचारी संगोष्ठी में मुनि श्री योगसागर जी महाराज के सानिध्य में व्रतों और संयम पर चर्चा हुई।
कोटा के श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में मुनि श्री योगसागर जी महाराज के सानिध्य में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय ब्रह्मचारी संगोष्ठी के दौरान उपस्थित संत और श्रद्धालु।
कोटा में आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के जीवन-संस्मरणों, व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय ब्रह्मचारी संगोष्ठी सोमवार, 12 अक्टूबर 2026 को सानंद संपन्न हुई। श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी, कोटा में निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में आयोजित संगोष्ठी में व्रतों की मर्यादा, संयमित जीवन और आत्मशुद्धि के महत्व पर प्रकाश डाला गया। आश्विन शुक्ल द्वितीया और भगवान नेमिनाथ जी के ज्ञान कल्याणक के पावन अवसर पर आयोजित धार्मिक कार्यक्रम में श्रद्धालुओं ने विभिन्न अनुष्ठानों में भाग लेकर पुण्यार्जन किया।
मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार ग्रंथ की प्रवचन श्रृंखला के अंतर्गत श्लोक क्रमांक 70 एवं 71 की व्याख्या करते हुए श्रावक के धार्मिक जीवन में व्रतों की मर्यादा, आचरण की पवित्रता और आत्मकल्याण के लिए भावों की निर्मलता का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि जैन धर्म में धर्माचरण का उद्देश्य केवल बाहरी धार्मिक क्रियाओं का पालन करना नहीं, बल्कि अपने परिणामों को निर्मल बनाना और आत्मा को पाप कर्मों से दूर रखना है। व्रतों का वास्तविक महत्व तभी है, जब उनका पालन सम्यक श्रद्धा, विवेक और संयम के साथ किया जाए।
मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य को निरंतर अपने आचरण का परीक्षण करना चाहिए। उसे विचार करना चाहिए कि उसके कार्यों से किसी जीव को कष्ट तो नहीं पहुंच रहा है और उसके अंतरंग भावों में राग-द्वेष की वृद्धि तो नहीं हो रही है। आत्मचिंतन के माध्यम से व्यक्ति अपने दोषों को पहचानकर उनमें सुधार कर सकता है। व्रतों का लाभ तभी सार्थक होता है, जब उनका प्रभाव मनुष्य के विचारों, व्यवहार और जीवनचर्या में दिखाई दे। धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि जीवन के प्रत्येक कार्य में उसकी झलक दिखाई देनी चाहिए।
गृहस्थ जीवन में संयम और सदाचार के महत्व पर प्रकाश डालते हुए मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने श्रावकों को अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए धर्म, संयम और सदाचार को प्राथमिकता देने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि जीवन में विभिन्न परिस्थितियों के बीच विवेक को जागृत रखना तथा इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण बनाए रखना आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। सत्य, अहिंसा, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह जैसे सिद्धांतों को जीवन में उतारकर ही व्यक्ति अपने आचरण को श्रेष्ठ बना सकता है। धार्मिक क्रियाओं के साथ मन की पवित्रता, दूसरों के प्रति करुणा और आत्मनिरीक्षण की प्रवृत्ति भी आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि धर्म का प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने के बावजूद यदि मनुष्य के व्यवहार में विनम्रता, करुणा, संयम और सदाचार का विकास नहीं होता, तो उसे अपने भावों और परिणामों की शुद्धि के प्रति अधिक जागरूक होने की आवश्यकता है।
ज्ञान को आचरण में उतारने को सच्ची साधना का आधार बताते हुए मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य को बाहरी उपलब्धियों के साथ अपने आंतरिक व्यक्तित्व के निर्माण पर भी ध्यान देना चाहिए। ज्ञान का वास्तविक महत्व तभी है, जब वह आचरण में परिणत हो। केवल ज्ञान सुनना या शास्त्रों का अध्ययन करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस ज्ञान के अनुरूप जीवन को ढालना भी आवश्यक है। व्रतों के प्रति निष्ठा, संयमित जीवन और आत्मशुद्धि की भावना सच्चे धर्माचरण की पहचान हैं। मनुष्य को अपने भावों का निरीक्षण करते हुए राग-द्वेष कम करने और निर्मल परिणामों की दिशा में निरंतर प्रयास करना चाहिए।
मुनि श्री ने कहा कि आत्मकल्याण का मार्ग भीतर से प्रारंभ होता है। जब व्यक्ति अपने विचारों, भावों और आचरण को शुद्ध करने का पुरुषार्थ करता है, तभी उसका धार्मिक जीवन सार्थक बनता है। प्रवचन का मूल संदेश रहा कि व्रतों की मर्यादा, संयमित जीवन, सदाचार और भावों की शुद्धि अपनाकर ही मनुष्य अपने जीवन को आध्यात्मिक दिशा दे सकता है। ज्ञान को आचरण में उतारना और प्रत्येक परिस्थिति में आत्मचिंतन बनाए रखना सच्चे धर्माचरण का आधार है।
दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय ब्रह्मचारी संगोष्ठी में आचार्य भगवन श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के जीवन-संस्मरणों, व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर चिंतन किया गया। उनके आदर्शों से प्रेरणा लेकर साधना, संयम, स्वाध्याय और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने का संदेश दिया गया। मुनि श्री योगसागर जी महाराज के सान्निध्य में आयोजित संगोष्ठी में आचार्य श्री के विचारों और जीवन से प्रेरणा लेने के भाव को प्रमुखता मिली।
धार्मिक आयोजनों के अंतर्गत श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन और शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन राजेंद्र जी, रजनी जी एवं समस्त गोधा परिवार ने भक्तिभावपूर्वक किया। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि कलश स्थापना का पुण्यलाभ भी श्रद्धालु परिवार ने प्राप्त किया।
श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमान राजकुमार जी, पटनी परिवार, जयपुर; श्रीमान प्रमोद कुमार, मेघा एवं संजय लुहाड़िया परिवार तथा श्रीमती सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार ने श्रद्धाभावपूर्वक किया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्रीमान बोधराज, अशोक एवं राजकुमार दुगेरिया परिवार ने भक्तिभाव से किया। वहीं, श्री सुनील माडिया के अनुसार मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ ओमप्रकाश जी, दीपेश, संदीप एवं समस्त ठग परिवार को प्राप्त हुआ। मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य रमेश चंद जी निर्मला देवी धनोत्या परिवार को प्राप्त हुआ।
इस अवसर पर मंगलाचरण का पुण्य अवसर प्राप्त हुआ। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना की, अर्घ्य समर्पित किया और जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया। संगोष्ठी और प्रवचन के माध्यम से व्रतों के पालन, संयम, सदाचार तथा भावों की निर्मलता को आत्मकल्याण के लिए आवश्यक बताते हुए धार्मिक जीवन में ज्ञान और आचरण के समन्वय का संदेश दिया गया।