उत्तम आकिंचन्य धर्म की आराधना: वैराग्य, शुद्धि और मोक्ष का बताया मार्ग
कोटा के जैन मंदिर में उत्तम आकिंचन्य धर्म की आराधना हुई। रेशु दीदी ने वैराग्य, अपरिग्रह और आत्मशुद्धि से मोक्ष का मार्ग समझाया।
स्वीर में कुन्हाड़ी स्थित जैन मंदिर में सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान नृत्य करते श्रद्धालु।
कुन्हाड़ी क्षेत्र के बालिता रोड स्थित मारवाड़ी श्री पद्मप्रभु अग्रवाल दिगंबर जैन मंदिर में दशलक्षण महापर्व के तहत उत्तम आकिंचन्य धर्म की आराधना श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई। इस अवसर पर आयोजित रात्रिकालीन धर्मसभा में शाश्वतधाम श्री सम्मेद शिखरजी से कोटा प्रवास पर पधारीं बाल ब्रह्मचारिणी रेशु दीदी ने श्रद्धालुओं को उत्तम आकिंचन्य धर्म के आध्यात्मिक महत्व से अवगत कराया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए रेशु दीदी ने कहा कि उत्तम आकिंचन्य धर्म का मूल भाव निरासक्ति, त्याग, अपरिग्रह और आत्मिक वैराग्य है। मनुष्य जितना बाहरी वस्तुओं, संबंधों और मोह-माया के प्रति आसक्ति रखता है, उतना ही आत्मस्वरूप से दूर होता जाता है। उन्होंने कहा कि संसार की वस्तुओं का त्याग केवल बाहरी रूप से करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मन से भी उनके प्रति आसक्ति का त्याग आवश्यक है।
उन्होंने कहा, “सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं के संग्रह में नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और आत्मानुभूति में निहित है। वैराग्य से शुद्धि होती है और शुद्धि से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। इसलिए उत्तम आकिंचन्य धर्म आत्मा को बंधनों से मुक्त कर मोक्ष की दिशा में ले जाने वाली महत्वपूर्ण साधना है।”
मंदिर समिति अध्यक्ष ज्ञानचंद जैन ने बताया कि दशलक्षण पर्व के दौरान आयोजित धार्मिक आयोजनों में समाज के सभी वर्गों की सहभागिता बढ़ रही है। रेशु दीदी के मार्गदर्शन में प्रतिदिन दोपहर जैन दर्शन की ‘छह ढाला’ कक्षाएं भी नियमित रूप से संचालित हो रही हैं।
समिति के वरिष्ठ सदस्य गणपतलाल जैन, बाबूलाल जैन, शंभू जैन, महेंद्र जैन, राजकुमार जैन, टीकम जैन, अतुल जैन, लोकेश जैन और अंकित जैन ने बताया कि पर्व के दौरान श्रद्धालु धार्मिक अनुष्ठानों, प्रवचनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उत्साहपूर्वक भाग ले रहे हैं।
मंदिर में प्रतिदिन संगीतमय शांतिधारा, अभिषेक, नित्य पूजन, दशलक्षण विधान पूजन और आरती सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान हो रहे हैं। वहीं कपल प्रतियोगिता, ‘उसकी टोपी इसके सर’ और प्रश्न मंच जैसे सांस्कृतिक आयोजनों में बच्चों, युवाओं और महिलाओं ने उत्साह से भाग लिया।
मंदिर समिति के अनुसार, पर्युषण पर्व का समापन अनंत चतुर्दशी के अवसर पर श्रीजी के अभिषेक, विशेष पूजन और भव्य शोभायात्रा के साथ होगा। दशलक्षण महापर्व के दौरान चल रही धार्मिक आराधना में उत्तम आकिंचन्य धर्म के माध्यम से वैराग्य, शुद्धि और आत्मिक मुक्ति के भाव को प्रमुखता से रखा गया।