कोटा में आयोजित 133वें राष्ट्रीय दशहरा मेले के दौरान आयोजित समारोह में महापौर अनुसुईया गोस्वामी विदेशी पर्यटकों और अन्य गणमान्य लोगों के साथ मौजूद रहीं।   

कोटा, 20 अक्टूबर। हाड़ौती की ऐतिहासिक और रियासतकालीन परंपरा का प्रतीक 133वां राष्ट्रीय दशहरा मेला-2026 मंगलवार को राजसी वैभव और पारंपरिक ठाट-बाट के साथ आयोजित हुआ। रावण दहन से पहले गढ़ पैलेस में पारंपरिक दरीखाना सजा। पूजा-अर्चना के बाद शाम को भगवान लक्ष्मीनारायण जी की भव्य शाही सवारी निकाली गई। शोभायात्रा में पौराणिक युद्ध प्रसंगों के सजीव मंचन, देशभर के लोक कलाकारों की प्रस्तुतियों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज ने आयोजन को विशेष स्वरूप दिया।

मंगलवार को गढ़ पैलेस में सजे पारंपरिक दरीखाने में हाड़ौती क्षेत्र के पूर्व ठिकानों के प्रतिनिधि अपनी पारंपरिक और राजसी वेशभूषा में शामिल हुए। इस अवसर पर महापौर अनुसुईया गोस्वामी, उप महापौर विवेक राजवंशी सहित कई गणमान्य नागरिक मौजूद रहे। सभी ने एक-दूसरे को विजयादशमी की बधाई देते हुए रामा-श्यामी की। कार्यक्रम में जापान, चीन और ब्रिटेन से आए विदेशी पर्यटक भी उपस्थित रहे।

शुभ मुहूर्त में शाम 6:31 बजे गढ़ पैलेस से भगवान लक्ष्मीनारायण जी की सवारी हाथी पर सवार होकर शाही लवाजमे के साथ रवाना हुई। शोभायात्रा में महाराव इज्येराज सिंह खुली जीप में सवार होकर चल रहे थे। गढ़ पैलेस से शुरू हुई सवारी किशोरपुरा दरवाजे से होते हुए दशहरा मैदान स्थित विजयश्री रंगमंच तक पहुंची। यात्रा में सबसे आगे घुड़सवार और सेना के जवान चल रहे थे। उनके पीछे हाथी पर सवार भगवान लक्ष्मीनारायण जी का विमान था, जिसके साथ सेवक चंवर ढुलाते हुए चल रहे थे। मार्ग के दोनों ओर खड़े हजारों नागरिकों ने भगवान के जयकारे लगाकर शोभायात्रा का स्वागत किया।

शाही सवारी के दौरान रामायण के पौराणिक प्रसंग जीवंत हो उठे। शोभायात्रा में प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण, माता सीता, सुग्रीव, अंगद, विभीषण, नल-नील, जामवंत और बाहुबली हनुमान के पात्र शामिल हुए। वहीं, रावण की भूमिका में राजाराम कर्मयोगी मेघनाद और कुंभकर्ण के साथ नजर आए। वानर सेना और रावण की रक्षा सेना के बीच सड़क पर युद्ध का सजीव मंचन किया गया। रावण और जटायु के संघर्ष तथा खप्पर लेकर असुरों का संहार करती मां कालिका के रौद्र रूप ने दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया।

ऊंटगाड़ी पर बजते युद्ध के नगाड़ों और ढोल-ताशों की गूंज से पूरा माहौल भक्तिमय हो गया। वानर सेना के सदस्य रामधूनी के साथ तलवारबाजी करते नजर आए। पौराणिक युद्ध प्रसंगों के इस मंचन ने शोभायात्रा को धार्मिक आस्था और पारंपरिक वीरता के दृश्यों से जोड़ दिया।

शोभायात्रा को विशेष स्वरूप देने के लिए देश के विभिन्न राज्यों से आए लोक कलाकारों ने भी अपनी प्रस्तुतियां दीं। राजस्थान का प्रसिद्ध कच्ची घोड़ी नृत्य और कजरी नृत्य दर्शकों के आकर्षण का केंद्र रहे। उदयपुर की भील और सहरिया जनजातियों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने भी आयोजन में लोक परंपराओं के रंग बिखेरे। इसके साथ ही अरुणाचल प्रदेश का टप्पू युद्ध नृत्य, पश्चिम बंगाल का छाऊ नृत्य और केरल का कुम्माटी लोक नृत्य प्रस्तुत किया गया।

आर्मी बैंड और पुलिस बैंड की मधुर स्वर लहरियों के बीच महिलाओं ने मंगल गीत गाए। पारंपरिक राजसी सवारी, राम-रावण युद्ध के जीवंत दृश्यों, धार्मिक जयकारों और विभिन्न राज्यों की लोक कलाओं के संगम के साथ कोटा का 133वां राष्ट्रीय दशहरा मेला-2026 हाड़ौती की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा का साक्षी बना।

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