कोटा दशहरा मेला 2026: शिव धनुष टूटते ही गूंजे जय श्रीराम के जयकारे, लक्ष्मण-परशुराम संवाद ने मोहा मन
नगर निगम कोटा द्वारा आयोजित 133वें राष्ट्रीय मेला दशहरा में चौथे दिन कलाकारों ने धनुष यज्ञ और लक्ष्मण-परशुराम संवाद का प्रभावशाली मंचन किया।
कोटा के 133वें राष्ट्रीय मेला दशहरा 2026 में रामलीला मंचन के चौथे दिन महापौर अनुसूइया गोस्वामी और जनप्रतिनिधियों ने प्रभु श्रीराम के स्वरूपों की पूजा-अर्चना कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।
कोटा में 133वें राष्ट्रीय मेला दशहरा 2026 के अंतर्गत आयोजित रामलीला के चौथे दिन धनुष यज्ञ और सीता स्वयंवर के प्रसंगों ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। प्रभु श्रीराम के शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाते ही पूरा रंगमंच प्रांगण जय श्रीराम और जय सियाराम के उद्घोष से गूंज उठा। राघवेंद्र कला संस्थान के सुप्रसिद्ध कलाकारों ने जीवंत अभिनय से पुष्प वाटिका, धनुष यज्ञ और लक्ष्मण-परशुराम संवाद के पौराणिक प्रसंगों का प्रभावशाली मंचन किया।
कोटा, 14 अक्टूबर। 133वें राष्ट्रीय मेला दशहरा 2026 के अंतर्गत नगर निगम कोटा की ओर से आयोजित रामलीला मंचन के चौथे दिन बुधवार को सांस्कृतिक मंच पर भक्ति और रोमांच से भरपूर प्रसंग प्रस्तुत किए गए। राघवेंद्र कला संस्थान के कलाकारों के अभिनय ने उपस्थित जनसमूह को भावविभोर कर दिया। महापौर अनुसूइया गोस्वामी ने प्रभु श्रीराम के प्रतिरूपों का पूजन कर रामलीला का शुभारंभ किया। इस दौरान विभिन्न पार्षदों, भाजपा शहर जिला कार्यकारिणी के सदस्यों, मंडल अध्यक्षों और मंडल प्रतिनिधियों ने भी आरती में हिस्सा लिया।
रामलीला की शुरुआत पुष्प वाटिका प्रसंग से हुई। इसमें प्रभु श्रीराम और माता सीता के प्रथम दर्शन का मंचन किया गया। इसके बाद रावण-बाणासुर संवाद प्रस्तुत हुआ, जिसमें दोनों पात्रों के अहंकार और संवाद शैली ने दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया।
धनुष यज्ञ के प्रसंग में राजा जनक की सभा में उपस्थित कोई भी महीप भगवान शिव के धनुष को हिला तक नहीं सका। सभी राजाओं के असफल रहने पर राजा जनक की व्याकुलता बढ़ गई। यह देखकर महर्षि विश्वामित्र ने प्रभु श्रीराम को आज्ञा दी, “उठहुँ राम भंजहुँ भव चापा, मेटहुं तात जनक परितापा..” गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए प्रभु श्रीराम ने जैसे ही शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई, धनुष टूट गया। इस दृश्य के साथ ही रंगमंच प्रांगण जय श्रीराम और जय सियाराम के गगनभेदी जयकारों से गूंज उठा। इसके बाद देवी सीता ने प्रभु श्रीराम के गले में वरमाला डालकर उनका वरण किया और स्वयंवर संपन्न हुआ। इस प्रसंग पर दर्शकों ने करतल ध्वनि से कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।
शिव धनुष टूटने की प्रचंड ध्वनि के बाद भगवान परशुराम का आगमन हुआ। उनकी गर्जना से रंगमंच प्रांगण में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। इसके बाद लक्ष्मण-परशुराम संवाद का मंचन हुआ, जो संध्या का प्रमुख आकर्षण रहा। लक्ष्मण के तार्किक और तीखे उत्तरों तथा भगवान परशुराम के क्रोध के बीच हुए संवाद ने दर्शकों को रोमांचित कर दिया। दोनों पात्रों के बीच तीखे संवादों और प्रभावशाली अभिनय ने प्रसंग को जीवंत बना दिया।
प्रभु श्रीराम की सौम्यता और विनम्रता से अंततः महर्षि परशुराम का क्रोध शांत हुआ। पूरी प्रस्तुति के दौरान रामचरितमानस की सुमधुर चौपाइयों, आकर्षक संवादों और सुरीले संगीतमय गीतों ने वातावरण को धर्ममय बनाए रखा। इस तरह रामलीला के चौथे दिन धनुष यज्ञ, सीता स्वयंवर और लक्ष्मण-परशुराम संवाद के मंचन ने दर्शकों के बीच भक्ति और उत्साह का माहौल बनाया।