कोटा में रत्नकरण्डक श्रावकाचार स्वाध्याय के दौरान प्रवचन देते मुनि योगसागर जी महाराज।   

कोटा में अनर्थदंड व्रत की महत्ता समझाते हुए निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने कहा कि अनावश्यक पापकारी गतिविधियों से बचना, दुर्बुद्धि का त्याग करना और अपने भावों को शुद्ध बनाना ही आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग है। उन्होंने श्रावकों को दूसरों के दोष खोजने के बजाय अपने विचारों, व्यवहार और मन, वचन एवं काया की गतिविधियों का निरंतर निरीक्षण करने की प्रेरणा दी।

बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 को आश्विन शुक्ल चतुर्थी के पावन अवसर पर श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी, कोटा में आयोजित रत्नकरण्डक श्रावकाचार स्वाध्याय श्रृंखला के अंतर्गत मुनि श्री ने श्लोक क्रमांक 75 एवं 76 पर प्रवचन दिए। इस दौरान उन्होंने अनर्थदंड व्रत के उद्देश्य, उसके पांच भेद और आत्मशुद्धि में इसकी भूमिका को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि जीवन में धर्म और पुण्य की दिशा में प्रवृत्त होना तथा अनावश्यक पापकारी क्रियाओं से बचना ही इस व्रत का प्रमुख उद्देश्य है। शिक्षा की सार्थकता तभी है, जब वह मनुष्य को उन्नति के मार्ग पर ले जाए और उसके भावों एवं परिणामों को विशुद्ध बनाए।

अनर्थदंड के पांच भेदों को समझना आवश्यक

मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने बताया कि अनर्थदंड के पांच प्रमुख भेद पापोपदेश, हिंसादान, अपध्यान, दुश्रुति तथा प्रमादचर्या हैं। पापोपदेश का अर्थ दूसरों को पापपूर्ण कार्य करने की सलाह देना या ऐसी गतिविधियों के लिए प्रेरित करना है, जिनसे जीवों को कष्ट पहुंचे। इसी प्रकार हिंसा के साधन उपलब्ध कराना और दूसरों को पीड़ा पहुंचाने वाले कार्यों को प्रोत्साहित करना भी पाप का कारण बनता है।

उन्होंने कहा कि अनावश्यक रूप से अशुभ विचारों में लीन रहना, आर्तध्यान और रौद्रध्यान में प्रवृत्त होना तथा व्यर्थ की चर्चाओं और गतिविधियों में समय गंवाना आत्मकल्याण के मार्ग में बाधक है। इन प्रवृत्तियों से बचने के लिए व्यक्ति को अपने विचारों, व्यवहार और दिनचर्या के प्रति सजग रहना चाहिए।

महाराज श्री ने कहा कि ऐसी प्रवृत्तियां संसार के दुःखों को बढ़ाती हैं। मनुष्य अपनी दुर्बुद्धि, प्रमाद और कषायों के प्रभाव में आकर अनुचित कार्यों में संलग्न हो जाता है। क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषाय अशुभ भावों को बढ़ाते हैं तथा नवीन कर्मबंध का कारण बनते हैं। इसलिए प्रत्येक श्रावक को अपनी मन, वचन और काया की गतिविधियों का निरंतर निरीक्षण करना चाहिए।

दूसरों के दोष खोजने के बजाय अपने परिणामों पर दें ध्यान

मुनि श्री ने प्रवचन में प्रेरणा देते हुए कहा कि व्रत धारण करने के बाद साधक की दृष्टि दूसरों के दोष खोजने के बजाय अपने भीतर होनी चाहिए। अपने परिणामों का प्रतिक्षण निरीक्षण करना, मन को प्रशिक्षित करना और विचारों पर नियंत्रण रखना आत्मशुद्धि की दिशा में आवश्यक कदम हैं।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को यह विचार करना चाहिए कि उसकी कौन-सी प्रवृत्ति आत्मकल्याण में बाधक बन रही है और वह अपनी दुष्प्रवृत्ति को किस प्रकार सुप्रवृत्ति में बदल सकता है। केवल दूसरों को उपदेश देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि धर्म का वास्तविक प्रभाव अपने आचरण में दिखाई देना चाहिए। जब व्यक्ति स्वयं के दोषों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करता है, तभी उसकी साधना सार्थक बनती है।

वाणी और बुद्धि का सदुपयोग करने की प्रेरणा

पापोपदेश से बचने की प्रेरणा देते हुए मुनि श्री ने कहा कि ऐसी चर्चाओं, व्यापारिक गतिविधियों और कार्यों से दूर रहना चाहिए, जिनसे जीवों को पीड़ा पहुंचे या हिंसा को प्रोत्साहन मिले। धर्म की चर्चा बार-बार करने से उसके प्रति रुचि और श्रद्धा बढ़ती है, जबकि पापपूर्ण कार्यों का बार-बार वर्णन, समर्थन और प्रोत्साहन मनुष्य की प्रवृत्ति को अधर्म की ओर ले जा सकता है। इसलिए वाणी का उपयोग सद्विचारों, सदुपदेशों और कल्याणकारी कार्यों के लिए करना चाहिए।

महाराज श्री ने स्पष्ट किया कि अनैतिक साधनों से धन अर्जित करना, दूसरों के हितों की उपेक्षा करना और जानबूझकर अनुचित कार्यों में प्रवृत्त होना व्यक्ति के भावों को अशुद्ध बनाता है। किसी कार्य का मूल्यांकन केवल उसके बाहरी स्वरूप से नहीं, बल्कि उसके पीछे निहित भाव और उद्देश्य से भी किया जाना चाहिए। मनुष्य को अपनी बुद्धि, सामर्थ्य और पुरुषार्थ का उपयोग सद्कार्यों में करना चाहिए।

दुर्बुद्धि का त्याग ही आत्मकल्याण की दिशा

प्रवचन के निष्कर्ष में मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि अनर्थदंड व्रत का सार अपने परिणामों का निरीक्षण करना, दुर्बुद्धि से बचना और सुबुद्धि की ओर अग्रसर होना है। जब व्यक्ति अपनी प्रत्येक प्रवृत्ति की समीक्षा करता है, अनावश्यक पापकारी कार्यों का त्याग करता है और आत्मशुद्धि के लिए निरंतर प्रयास करता है, तभी उसके जीवन में धर्म की वास्तविक साधना प्रारंभ होती है।

उन्होंने बताया कि आत्मकल्याण के लिए अशुभ परिणामों को त्यागकर शुभ एवं शुद्ध परिणामों की ओर बढ़ना आवश्यक है। विवेकपूर्ण जीवन, संयमित व्यवहार और कषायों पर नियंत्रण व्यक्ति को आत्मा की निर्मलता तथा मोक्षमार्ग की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में श्रद्धालुओं ने किया पुण्यार्जन

श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में आयोजित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक पुण्यार्जन किया। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्रद्धालु परिवार द्वारा किया गया। कलश स्थापना का पुण्यलाभ भी श्रद्धालु परिवार ने प्राप्त किया।

श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन राजेन्द्र, हुकम काका एवं प्रकाश हरसोरा परिवार; श्रीमती प्रेमलता, संजय एवं श्रेयांस गोधा परिवार तथा श्रीमती सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार द्वारा किया गया।

श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान में भी श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक पुण्यार्जन किया।

श्री सुनील माडिया के अनुसार, मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ महावीर जी मित्तल तथा श्रीमान त्रिलोक जी एवं रेखा जी लुहाड़िया परिवार को प्राप्त हुआ। वहीं, मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्रीमान देवेन्द्र जी, आशीष जी एवं मयंक जी हरसोरा परिवार को मिला। मंगलाचरण का पुण्य अवसर अंकिता को प्राप्त हुआ।

धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना की, अर्घ्य समर्पित किया और जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया। मुनि श्री योगसागर जी महाराज के प्रवचनों में अनर्थदंड व्रत के माध्यम से आत्मनिरीक्षण, दुर्बुद्धि के त्याग और शुद्ध भावों के विकास पर जोर दिया गया।

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