कोटा के आयुर्वेदिक कॉलेज में जल संरक्षण पर संगोष्ठी, दिलाई गई शपथ
जीओ गीता परिवार और कॉलेज के संयुक्त कार्यक्रम में वक्ताओं ने जल संकट से निपटने के लिए जीवनशैली में बदलाव और वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बताया।
कोटा के राजकीय आयुर्वेदिक महाविद्यालय में आयोजित संगोष्ठी के दौरान मुख्य अतिथि और अन्य गणमान्य व्यक्ति जल संरक्षण की शपथ लेते हुए।
कोटा, 2 जून। "जल है जीवन का आधार : संरक्षण ही समाधान" विषय पर राजकीय आयुर्वेदिक महाविद्यालय, कोटा के सभागार में आयोजित एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी में वक्ताओं ने जल संकट को रोकने के लिए जीवनशैली में आमूलचूल परिवर्तन का आह्वान किया। जीओ गीता परिवार, कोटा एवं राजकीय आयुर्वेदिक महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में जल संरक्षण के प्रति सामाजिक जागरूकता और व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर विशेष जोर दिया गया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कुलगुरु प्रो. भगवती प्रसाद सारस्वत ने उपस्थित जनसमूह को जल संरक्षण की शपथ दिलाई। उन्होंने अपनी बात रखते हुए चेतावनी दी कि यदि समय रहते जल संरक्षण को जीवन का अभिन्न हिस्सा नहीं बनाया गया, तो भविष्य में जल संघर्ष की स्थिति अत्यंत गंभीर हो सकती है। प्रो. सारस्वत ने रेखांकित किया कि पृथ्वी पर उपलब्ध जल का केवल तीन प्रतिशत ही पेयजल योग्य है, जिसे मानव समाज द्वारा निरंतर व्यर्थ बहाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि दैनिक जीवन की छोटी-छोटी आदतों में बदलाव लाकर जल संकट को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
जीओ गीता परिवार के अध्यक्ष चंद्रकांत खंडेलवाल ने बताया कि इस संगोष्ठी में जल संकट, वर्षा जल संचयन, जल प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण एवं युवाओं की भूमिका जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गहन विचार-विमर्श किया गया। कार्यक्रम में प्रदेश भाजपा प्रवक्ता एवं संरक्षक पंकज मेहता ने जल के अनियंत्रित दुरुपयोग और अंधाधुंध दोहन पर रोक लगाने की पुरजोर वकालत की। महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. नित्यानंद शर्मा ने संस्कृत उद्बोधन देते हुए जल को देवतुल्य बताया। वहीं, विशिष्ट अतिथि एवं शिक्षाविद् मनोज जैन ने कहा कि जल संरक्षण के संस्कार बचपन से ही विकसित किए जाने चाहिए और विद्यालयों व शैक्षणिक संस्थानों को इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
कार्यक्रम की भूमिका प्रस्तुत करते हुए प्रदेश संयोजक किशन पाठक ने कहा कि जल संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं का विषय नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व है। उन्होंने घर, विद्यालय, कार्यालय और सार्वजनिक स्थलों पर विवेकपूर्ण उपयोग की आवश्यकता पर बल देते हुए वर्षा जल संचयन, पारंपरिक जल स्रोतों का संरक्षण, तालाबों एवं बावड़ियों के पुनर्जीवन तथा भूजल पुनर्भरण को समय की अनिवार्य आवश्यकता बताया। इस अवसर पर जीओ गीता परिवार की पदाधिकारी सारिका मित्तल ने गीता मनीषी महामंडलेश्वर स्वामी ज्ञानानंद महाराज का प्रेरक संदेश वाचन किया, जिसमें श्रीमद्भगवद्गीता के दृष्टिकोण से जल संरक्षण का महत्व समझाया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा भारत माता एवं धन्वन्तरि देवी के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन और माल्यार्पण के साथ हुआ। सभी अतिथियों का उपरना ओढ़ाकर, तुलसी का पौधा भेंट कर एवं स्वामी ज्ञानानंद महाराज द्वारा लिखित गीता प्रेरणा पुस्तक देकर सम्मान किया गया। कार्यक्रम का संचालन चन्द्रप्रकाश नागर ने किया और आभार चंद्रकांत खंडेलवाल ने व्यक्त किया। इस अवसर पर अतिरिक्त निदेशक आयुर्वेद डॉ. अंजना शर्मा, बाबूलाल भाट, हरि सुदन शर्मा, नवल गर्ग, आचार्य चन्द्रशेखर, अनीता चौहान, जगदीश बडेरा, कुंजबिहारी नदंवाना, सारिका मित्तल, रचना पाठक, घनश्याम शर्मा, ललित चितौडा, जगदीश शर्मा, लीलाधर गुप्ता एवं महेंद्र विजय सहित अनेक गणमान्य नागरिक और विभिन्न संस्थाओं के पदाधिकारी उपस्थित रहे।