सरपंच की कुर्सी के लिए गांवों में सियासी हलचल तेज, आरक्षण साफ होते ही दावेदार सक्रिय
बस्सी में पंचायत राज चुनाव को लेकर आरक्षण की तस्वीर साफ होते ही सरपंच पद के दावेदार सक्रिय हो गए हैं। गांवों में जनसंपर्क, बैठकें, सोशल मीडिया प्रचार और जातिगत-सामाजिक समीकरणों पर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
तस्वीर में पंचायत चुनाव का लोगो और मतदान के लिए उठी हुई उंगलियां दिख रही हैं। यह तस्वीर काल्पनिक है और एआई द्वारा केवल संदर्भ के लिए बनाई गई है।
बस्सी। (गोपाल खटीक)। पंचायत राज चुनाव में सरपंचों की लॉटरी खुलने और आरक्षण की तस्वीर साफ होते ही गांवों की सियासत ने करवट ले ली है। पंचायतों में सरपंच की कुर्सी हासिल करने के लिए संभावित दावेदारों की सक्रियता बढ़ गई है। चुनावी चर्चा अब चौपालों तक सीमित नहीं रह गई है। जनसंपर्क, बैठकें और समर्थन जुटाने की होड़ शुरू हो गई है।
आरक्षण की लॉटरी ने कई दावेदारों के चुनावी समीकरण बदल दिए हैं, जबकि कई नए चेहरे भी मैदान में उतर आए हैं। कई जगह वर्षों से चली आ रही आपसी रंजिश, व्यक्तिगत नाराजगी और पारिवारिक दूरी को पाटने की कवायद शुरू हो गई है। वहीं कुछ स्थानों पर पुरानी लड़ाइयां और तेज होती दिखाई दे रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में शाम ढलते ही चौपालों से लेकर बंद कमरों तक बैठकों का सिलसिला शुरू हो गया है।
चुनावी तैयारियों के बीच सोशल मीडिया पर चुनाव प्रचार के पोस्टरों ने भी माहौल बनाना शुरू कर दिया है। वाट्सएप ग्रुपों और सोशल मीडिया माध्यमों पर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार क्षेत्र के विकास के दावे कर रहे हैं। एआई के माध्यम से पोस्टर तैयार कर सोशल मीडिया पर डाले जा रहे हैं।
राजनीतिक समीकरणों के साथ जातिगत और सामाजिक समीकरणों की भी जानकारी जुटाई जा रही है। वार्डवार वोटों के अनुमान और वोट बैंक को अपने पक्ष में करने की रणनीति पर चर्चाएं तेज हैं। ग्राम पंचायत के चुनाव भले ही राजनीतिक दलों के चुनाव चिन्ह पर नहीं लड़े जाते हों, लेकिन राजनीतिक कार्यकर्ताओं की नजरें संभावित समीकरणों पर टिकी हुई हैं। सरपंच के संभावित प्रत्याशी भी अपने व्यक्तिगत प्रभाव और समर्थन के आधार की थाह लेने में जुटे हैं।
चुनावी मौसम के साथ गांव की चौपालों का मिजाज भी बदलता नजर आ रहा है। लंबे समय से गांव की राजनीति को करीब से देखने वाले बुजुर्ग भी हाल-चाल पूछने के बहाने पहुंचने वाले लोगों से चुटकी लेते नजर आ रहे हैं। आरक्षण की तस्वीर साफ होने के बाद गांवों में सरपंच पद को लेकर सक्रियता बढ़ने से चुनावी माहौल अब चौपालों और बैठकों में साफ दिखाई देने लगा है।