चित्तौड़गढ़ के आकोला में मेवाड़ का पारंपरिक खेल-नृत्य गवरी आयोजित
भील कलाकारों ने धार्मिक प्रसंगों और नाटकों की दी प्रस्तुति, मौसमी बीमारियों से बचाव और सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है मंचन।
तस्वीर में पारंपरिक पोशाक पहने कलाकार दर्शकों के सामने गवरी नृत्य और नाटक का मंचन कर रहे हैं।
आकोला। चामुंडा माता जी के तत्वावधान में नगरपालिका के सुरता खेड़ा में मेवाड़ का पारंपरिक खेल-नृत्य गवरी का मंचन मेवाड़ क्षेत्र के भील कलाकारों द्वारा किया जा रहा है। गवरी नृत्य देखने के लिए क्षेत्र से बड़ी संख्या में महिला, पुरुष और बच्चे पहुंचे और उत्साह के साथ पारंपरिक नृत्य का आनंद लिया।
स्थानीय किर का खेड़ा, मेवाड़ा क्षेत्र में मेवाड़ी सियासत काल से इन कलाकारों द्वारा राजा-महाराजा और पंच-पटेलों के सानिध्य में गवरी खेल का मंचन किया जाता रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में गवरी कलाकारों के प्रदर्शन को लोग बड़ी रुचि से देखते हैं।
गवरी कलाकार ने बताया कि गवरी खेल के मंचन में 40 कलाकारों द्वारा आकर्षक नृत्य और नाटक प्रस्तुत किए गए। कलाकारों ने विभिन्न कारनामों का प्रदर्शन भी किया, जो लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा और ग्रामवासियों का मन मोह लिया।
गवरी नृत्य में बणजारा, कान्हा गुजरी और गाडूलिया की बोली बोलकर कलाकारों ने लोगों को खूब हंसाया। इसके अलावा प्रसंग, भोपा का भाव, घर सुख समाधान, राजा-रानी, कालका माता जी, कालुकिर, हठिया डालमा, चोर-सिपाही, देवी अंबा, दाणी, वरजु कांजरी आदि का मंचन किया जाता है।
बताया गया है कि ऐसी मान्यता है कि गांव में गवरी नृत्य करने से माताजी की कृपा से मौसमी बीमारियां एवं महामारी नहीं फैलती तथा क्षेत्र में खुशहाली और सुख-समृद्धि रहती है। मेवाड़ की इस पारंपरिक लोककला के मंचन में बड़ी संख्या में ग्रामीणों की भागीदारी इसके प्रति स्थानीय लोगों की रुचि को दर्शाती है।