चित्तौड़गढ़ रामद्वारा: शिव-पार्वती विवाह प्रसंग में बताया सद्गुण का महत्व
संत दिग्विजय राम महाराज ने कथा में रूप के बजाय सद्गुण और संस्कारों को जीवन की सबसे बड़ी धरोहर बताया।
व्यासपीठ पर बैठकर माइक से कथा सुनाते हुए संत दिग्विजय राम महाराज।
चित्तौड़गढ़ रामद्वारा में चातुर्मासिक सत्संग के तहत आयोजित महा शिव पुराण कथा में संत दिग्विजय राम महाराज ने शिव-पार्वती विवाह प्रसंग के माध्यम से सद्गुण और संस्कारों का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि सद्गुण और संस्कार जीवन की सबसे बड़ी धरोहर होते हैं, लेकिन संसार गुणों पर नहीं, रूप पर मोहित होता है।
शिव पुराण कथा के शिव-पार्वती विवाह प्रसंग का वर्णन करते हुए संत दिग्विजय राम महाराज ने बताया कि जैसे ही वर के रूप में माता पार्वती की माता मैना भगवान महादेव को देखती हैं, उन्हें सप्त ऋषियों, नारद, अरुणवती और वशिष्ठ ऋषि पर क्रोध आता है। मैना नारद से कहती हैं कि तुमने तो सोना लेकर काच दे दिया है। वह पार्वती से कहती हैं कि तुम शंकर को वर बनाना चाहती हो, इसलिए तुमसे ज्यादा मूर्ख कौन हो सकता है।
मैना पार्वती का विवाह भगवान महादेव के साथ नहीं करने का हठ करती हैं। इस पर नारद ऋषि मैना को समझाते हैं कि उन्होंने अभी महादेव का वास्तविक रूप देखा ही नहीं है। माता पार्वती मैना से कहती हैं कि तीनों लोक में भगवान महादेव से श्रेष्ठ कोई नहीं है। उन्होंने शंकर का वरण कर लिया है, इसलिए उनके अलावा किसी से भी विवाह नहीं करेंगी।
भगवान विष्णु भी मैना को समझाते हैं कि वह रूप को देखकर अपनी पुत्री का विवाह महादेव से नहीं करवाना चाहती हैं। यदि महादेव अपना स्वरूप सुंदर कर लें तो क्या वह पार्वती का विवाह उनके साथ करवा देंगी। इस पर मैना हां कह देती हैं।
भगवान विष्णु के कहने पर महादेव अपना रूप बदल लेते हैं। इसके बाद वे कामदेव से भी सुंदर दिखाई देते हैं। नारद मैना से कहते हैं कि तुम्हारी इच्छा के अनुसार शिव ने सुंदर रूप धारण किया है। महादेव के सुंदर रूप के दर्शन कर मैना का सारा क्रोध शांत हो जाता है।
मैना पार्वती से कहती हैं कि तुमने कठिन तपस्या कर हम सबको धन्य किया है। सभी माता पार्वती की महिमा करते हैं और इस तरह माता पार्वती और महादेव का विवाह आनंदपूर्वक संपन्न होता है।
चित्तौड़गढ़ रामद्वारा में आयोजित शिव महापुराण कथा का श्रवण करने के लिए प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। कथा के शिव-पार्वती विवाह प्रसंग में रूप, सद्गुण, संस्कार और भक्ति के संदर्भ को श्रद्धालुओं के समक्ष रखा गया।