चित्तौड़गढ़: बड़ी सादड़ी कथा में बोले संत दिग्विजय, शिव-पार्वती विवाह प्रसंग सुनाया
रामद्वारा में चातुर्मासिक सत्संग के दौरान संत दिग्विजय राम महाराज ने संस्कार और ईमानदारी को जीवन की सबसे बड़ी पूंजी बताया।
तस्वीर में संत दिग्विजय राम महाराज व्यासपीठ पर बैठकर माइक से कथा सुनाते हुए दिख रहे हैं।
बड़ी सादड़ी। चित्तौड़गढ़ रामद्वारा में चातुर्मासिक सत्संग के तहत आयोजित महाशिव पुराण कथा में संत दिग्विजय राम महाराज ने संस्कार और ईमानदारी को जीवन की सबसे बड़ी पूंजी बताते हुए कहा कि संस्कारों से बड़ी कोई वसीयत नहीं होती और ईमानदारी से बड़ी कोई विरासत नहीं होती। उन्होंने कहा कि जिसके जीवन में संस्कार और ईमानदारी है, उसके जीवन में आनन्द ही आनन्द है।
कथा के दौरान संत दिग्विजय राम महाराज ने भगवान महादेव और माता पार्वती के विवाह का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि भगवान शिव की बारात में देवताओं सहित सभी गणों की टोलियां शामिल थीं। कोई भस्म, कुण्डल और रुद्राक्ष धारण किए हुए था। बारात में सबसे आगे चण्डी चल रही थीं, ताकि शुत्रुओं में भय पैदा हो जाए। उनके साथ ग्यारह हजार गण भी थे। शंखनाद से तीनों लोक गूंज रहे थे।
संत दिग्विजय राम महाराज ने कथा प्रसंग में बताया कि भगवान विश्वकर्मा सबसे पहले पहुंचकर मंडप सजाए और मूर्तियां बनाई। यह सनातन की परंपरा रही है। माता पार्वती का विवाह भगवान महादेव से होने जा रहा था, इसलिए उनके पिता राजा हिमाचल राज बहुत प्रसन्न थे।
पार्वती की माता मैना भगवान महादेव को देखने के लिए उत्सुक थीं। वह महल के सबसे ऊपर जाकर खड़ी हो गईं। बारात में वरुण, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, भगवान विष्णु और ब्रह्मा को देखकर मैना ने नारद से पूछा कि क्या इनमें से ही महादेव हैं। नारद ने कहा कि नहीं, यह महादेव नहीं हैं।
इसके बाद मैना ने भगवान शिव के चारों तरफ चल रहे भूत, प्रेत, पिशाच और गणों को देखा। किसी के सिर नहीं था तो कोई डरावना लग रहा था। यह दृश्य देखकर मैना भयभीत हो गईं। नारद ऋषि ने जैसे ही मैना को नंदी पर विराजमान भगवान महादेव के दर्शन कराए, मैना उन्हें देखकर मूर्छित हो गईं।
महाशिव पुराण कथा में भगवान महादेव और माता पार्वती के विवाह प्रसंग के माध्यम से संत दिग्विजय राम महाराज ने संस्कार और ईमानदारी को जीवन की महत्वपूर्ण विरासत बताया।