चित्तौड़गढ़ के धनेत कलां में गवरी लोक नाट्य का मंचन, पहुंचे सैकड़ों ग्रामीण
दाता चौराहा परिसर में कलाकारों ने कालू कीर और दानव-देव युद्ध समेत कई प्रसंगों की प्रस्तुति दी, मांदल की थाप पर सामूहिक नृत्य हुआ।
तस्वीर में पारंपरिक पोशाक पहने कलाकार दर्शकों के सामने गवरी लोक नाट्य की प्रस्तुति दे रहे हैं।
चित्तौड़गढ़। धनेत कलां गांव के दाता चौराहा परिसर में माताजी की पंडोली के कलाकारों ने गवरी का भव्य मंचन कर लोक नाट्य संस्कृति की जीवंत छटा प्रस्तुत की। गवरी देखने के लिए आसपास के गांवों मिश्रो की पीपली, धनेट खुर्द, डगला का खेड़ा, बोदियायाना और गणेशपुरा से सैकड़ों ग्रामीण पहुंचे।
पारंपरिक पोशाक, आभूषण और रूप-सज्जा में कलाकार जैसे ही परिसर में पहुंचे, ‘जय मां गवरी’ और ‘हर-हर महादेव’ के जयकारों से पूरा माहौल गूंज उठा। मंचन के दौरान राई बुढ़िया और राई माता ने पारंपरिक चाल और छड़ी संचालन के जरिए प्रस्तुति को दिशा दी।
फत्ता जी फत्तूडी और भोलिया भूत के प्रसंग में हास्य-व्यंग्य के जरिए कलाकारों ने दर्शकों का मनोरंजन किया। वहीं कालू कीर-कान गुजरी, बंजारा-बंजारी और मीणा-गुजरी के प्रसंगों में सामाजिक और पौराणिक कथाओं को मंच पर जीवंत किया गया।
दानव-देव युद्ध के दृश्यों में शिव-पार्वती की गाथा और असुरों के वध का मंचन हुआ। मांदल और कांसे की थाली की थाप पर कलाकारों ने घेरे में सामूहिक नृत्य प्रस्तुत किया। बच्चों, महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों सहित पूरा परिसर दर्शकों से भरा रहा।
गवरी मंचन के समापन पर ग्रामवासियों और आयोजन समिति ने सभी कलाकारों का फूल-मालाओं और साफा पहनाकर स्वागत किया। साथ ही उनकी लोकसाधना की सराहना की। आयोजन में पारंपरिक गवरी के विभिन्न प्रसंगों और सामूहिक प्रस्तुतियों ने धनेत कलां में लोक नाट्य संस्कृति की निरंतरता को मंच पर साकार किया।