आचार्य पुलकसागर महाराज मंच पर बैठकर भीलवाड़ा में श्रद्धालुओं को धर्म उपदेश दे रहे हैं।

भीलवाड़ा में पहली बार चातुर्मास कर रहे राष्ट्र संत आचार्य मनोज्ञाचार्य पुलकसागर महाराज ने जीवन में रिश्तों, दोस्ती, पारिवारिक संबंधों और कर्मों के महत्व पर महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि रिश्ते और दोस्ती हमेशा बराबरी के आधार पर होने चाहिए। जहां हैसियत दिखाने वाला कोई नहीं होता, वहीं प्रेम और सम्मान मिलता है। अपने से ऊंचे घरों में रिश्ते करने पर सम्मान नहीं मिलता और जहां बार-बार हैसियत का अहसास कराया जाता है, वहां रिश्ते निभाना मुश्किल हो जाता है। इसलिए हमेशा ऐसी जगह रहना चाहिए, जहां सम्मान, स्वाभिमान और बहुमान बना रहे। जिस स्थान पर जाकर इंसान खुद को छोटा महसूस करे, ऐसी बुलंदी पर नहीं जाना चाहिए।

श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट, मैन सेक्टर शास्त्रीनगर के तत्वावधान में सकल दिगम्बर जैन समाज की ओर से आयोजित चातुर्मास के दौरान गुरुवार को शास्त्रीनगर स्थित सूर्यमहल में आचार्य पुलकसागरजी महाराज ने अंतिम चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला ‘जीवन जीने की कला’ के नौवें दिन मंगल दिव्य देशना दी। इस दौरान उन्होंने कहा कि विवाह के बाद बेटी को मायके की संपत्ति पर अभिमान करने के बजाय ससुराल को ही अपना सबकुछ मानना चाहिए। इंसान के लिए मौत से भी बड़ा दर्द वह स्थिति होती है, जब अपने ही घर में अपनों के व्यवहार से अकेलेपन का अहसास होने लगता है। उस समय इंसान रोता तो बहुत है, लेकिन उसकी आवाज तक बाहर नहीं निकलती।

आचार्यश्री ने सुखी वैवाहिक और पारिवारिक जीवन के लिए कहा कि कभी भी पति या पत्नी, संतान अथवा सास-ससुर की तुलना दूसरों से नहीं करनी चाहिए और न ही दूसरों के सामने उनकी कमियां गिनानी चाहिए। पुरानी गलतियों का बोझ दिमाग में नहीं रखना चाहिए। जीवन में कितनी भी खराब स्थिति आ जाए, लेकिन कभी अपने पति या पत्नी को दूसरों के सामने नीचा नहीं दिखाना चाहिए। ऐसा करने से जीवन में तलाक की नौबत नहीं आएगी। उन्होंने कहा कि जब हम अपने ही लोगों को दूसरों के सामने नीचा दिखाने लगते हैं तो घर को नरक बनने में अधिक समय नहीं लगता। इसी तरह माता-पिता को अपनी संतान की तुलना दूसरों की संतान से भी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से संतान धीरे-धीरे उनसे दूर होती जाएगी।

कर्म और फल के संबंध में आचार्य पुलकसागर महाराज ने कहा कि शास्त्रों में बिना फल की इच्छा किए कर्म करने की शिक्षा दी गई है, जबकि व्यवहार में हम बिना फल की इच्छा के कोई काम नहीं करते। धर्म करते समय भी हमारे मन में पुण्य प्राप्त करने की इच्छा रहती है। भगवान की आराधना करने के बाद भी यदि संकट दूर नहीं हो रहे हैं तो समझना चाहिए कि हमारी भावना में कहीं गड़बड़ी है। भावना निर्मल और पावन हो जाए तो क्षमा मांगने की आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि भाव सामने वाले तक पहुंच जाते हैं। वहीं, क्षमा मांगने में भी यदि सूक्ष्म कषाय मौजूद है तो उसका अपेक्षित प्रभाव नहीं होता।

उन्होंने स्पष्ट किया कि कर्म कर फल की इच्छा नहीं रखने का अर्थ यह है कि जिस प्रकार का कर्म किया जा रहा है, उसके विपरीत फल की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। पाप करने पर पुण्य का फल नहीं मिल सकता और पुण्य करने पर पाप का फल नहीं मिलेगा। फल मनुष्य की इच्छा के अनुसार नहीं, बल्कि उसके कर्मों के अनुसार मिलता है। हम पुण्य पसंद करते हैं, लेकिन जीवन में पाप के रास्ते पर चलते हैं तो पुण्य का फल प्राप्त नहीं होगा।

श्री पुलकसागर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष प्रवीण चौधरी ने बताया कि आचार्य श्री पुलकसागर महाराज का ऐतिहासिक चातुर्मास सम्पन्न होने के बाद 15 नवम्बर को भीलवाड़ा से विहार होगा। इससे पहले एक से तीन नवम्बर तक आचार्यश्री का प्रवास बापूनगर दिगम्बर जैन मंदिर में रहेगा। आचार्यश्री के सानिध्य में धनतेरस से अमावस्या तक मंत्रों की साधना होगी।

चातुर्मास के दौरान जिन श्रावक परिवारों ने मंगलकलश स्थापित किया था, वे अपने मंगलकलश 6 से 8 नवम्बर तक सुबह 8 से 10 बजे के बीच आचार्यश्री के आशीर्वाद से प्राप्त कर घर पर स्थापित कर सकेंगे। दीपावली पर भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण महोत्सव के अवसर पर आचार्यश्री के सानिध्य में निर्वाण लड्डू चढ़ाया जाएगा।

प्रवचन की शुरुआत में पुण्यार्जक परिवार को पाद प्रक्षालन और शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। कार्यक्रम का संचालन चातुर्मास समिति के महामंत्री जयकुमार पाटनी ने किया। चातुर्मास समिति के संयोजक मनीष शाह और सह संयोजक लोकेश अजमेरा ने बताया कि 31 अक्टूबर तक प्रतिदिन सुबह 8.45 से 10 बजे तक आचार्यश्री के मुखारबिंद से दिव्य देशना होगी। इसके साथ ही प्रतिदिन शाम 6.30 से 7.30 बजे तक आनंद यात्रा (प्रश्न मंच) का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें शहर के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु शामिल होकर लाभ प्राप्त कर रहे हैं। 15 नवम्बर को आचार्यश्री के विहार के साथ भीलवाड़ा में उनके चातुर्मास का समापन होगा।

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