वंदे मातरम् के 150 वर्ष: विद्या भारती के नवीन कुमार झा का विशेष साक्षात्कार
विद्या भारती राजस्थान के प्रचार प्रमुख ने वंदे मातरम् के 150वें वर्ष पर नई पीढ़ी, राष्ट्रीय चेतना और मातृभूमि के प्रति कर्तव्यों के महत्व पर प्रकाश डाला।
तस्वीर में विद्या भारती का 'नमामि भारतम्' वंदे मातरम् कार्यक्रम से जुड़ा पोस्टर दिख रहा है।
बारां। भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के 150 गौरवशाली वर्ष पूर्ण होने का अवसर केवल एक गीत की वर्षगांठ नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता-संघर्ष, राष्ट्रबोध, मातृभूमि के प्रति श्रद्धा तथा करोड़ों देशवासियों के त्याग और बलिदान की उस भावना का स्मरण है, जिसने भारतीय जनमानस को राष्ट्रीय चेतना से जोड़ा। इसी संदर्भ में विद्या भारती राजस्थान के प्रचार प्रमुख नवीन कुमार झा ने विशेष साक्षात्कार में ‘वंदे मातरम् के 150 वर्ष’ के महत्व, इसकी राष्ट्रीय चेतना में भूमिका और नई पीढ़ी के लिए इसके संदेश पर अपने विचार व्यक्त किए।
झा ने कहा कि वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूर्ण होना केवल किसी गीत की वर्षगांठ नहीं, बल्कि भारत के राष्ट्रबोध, स्वाभिमान और स्वतंत्रता-संघर्ष की चेतना के 150 वर्षों का स्मरण है। ‘वंदे मातरम्’ ने भारतभूमि को केवल एक भूखंड के रूप में नहीं, बल्कि मातृभूमि और माता के रूप में देखने का भाव जागृत किया। विद्या भारती की दृष्टि से यह अवसर नई पीढ़ी को अपने इतिहास, संस्कृति, मातृभूमि और राष्ट्रीय कर्तव्यों से जोड़ने का महत्वपूर्ण अवसर है।
‘वंदे मातरम् के 150 वर्ष’ कार्यक्रम की संकल्पना के पीछे के भाव पर उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ का भाव मातृभूमि को नमन करना है। इसमें अपनी भूमि के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता, प्रेम और समर्पण की भावना निहित है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की रचना ने आगे चलकर राष्ट्रीय चेतना को अभिव्यक्ति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘वंदे मातरम् के 150 वर्ष’ का मूल भाव यही है कि इस गौरवपूर्ण यात्रा को स्मरण किया जाए और उसके राष्ट्रीय मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए।
इस अभियान में विद्यार्थियों, आचार्यों, अभिभावकों और समाज की भूमिका पर झा ने कहा कि विद्या भारती के लिए विद्यार्थी केवल किसी कार्यक्रम के सहभागी नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के भावी वाहक हैं। विद्यार्थियों को वंदे मातरम् के इतिहास, साहित्यिक स्वरूप और राष्ट्रीय महत्व को समझना चाहिए। आचार्य इस राष्ट्रीय भाव को विद्यार्थियों तक पहुँचाने वाले मार्गदर्शक हैं। अभिभावकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। परिवार में मातृभूमि के प्रति सम्मान, राष्ट्रप्रेम और भारतीय संस्कृति के संस्कार का वातावरण तैयार करना आवश्यक है।
वंदे मातरम् के रचनाकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की राष्ट्र-जागरण में भूमिका पर उन्होंने कहा कि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने साहित्य को केवल मनोरंजन का माध्यम न मानकर उसे सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना का माध्यम बनाया। ‘वंदे मातरम्’ में उन्होंने भारतभूमि के प्रति श्रद्धा और मातृभाव को प्रभावशाली अभिव्यक्ति दी। आगे चलकर यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय जागरण और मातृभूमि के प्रति समर्पण की एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति बना।
स्वतंत्रता आंदोलन में ‘वंदे मातरम्’ की भूमिका बताते हुए विद्या भारती राजस्थान के प्रचार प्रमुख नवीन कुमार झा ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में ‘वंदे मातरम्’ केवल गीत नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय जागरण और स्वतंत्रता की आकांक्षा की अभिव्यक्ति बन गया। इसके माध्यम से लोगों ने मातृभूमि के प्रति प्रेम, स्वाभिमान, त्याग और संघर्ष की भावना को स्वर दिया।
‘वंदे मातरम् के 150 वर्ष’ के अवसर पर विद्या भारती के समाज के लिए संदेश पर झा ने कहा कि संदेश बहुत स्पष्ट है—वंदे मातरम् को केवल कंठ का गीत नहीं, जीवन का संस्कार बनाइए। मातृभूमि के प्रति श्रद्धा का अर्थ केवल भाव व्यक्त करना नहीं, बल्कि देश के प्रति अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना भी है। प्रकृति का संरक्षण, सामाजिक समरसता, स्वावलंबन, नागरिक कर्तव्यों का निर्वहन, भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा का सम्मान तथा अपने कार्य को राष्ट्रहित से जोड़ना—ये सभी मातृभूमि के प्रति हमारी वास्तविक श्रद्धा के रूप हैं।
‘वंदे मातरम्’ के माध्यम से विद्या भारती आने वाले भारत की कैसी तस्वीर प्रस्तुत करना चाहती है, इस पर उन्होंने कहा कि वे ऐसा भारत देखना चाहते हैं जो संस्कारवान, आत्मविश्वासी, स्वावलंबी, ज्ञानवान, चरित्रवान और राष्ट्रहित के लिए समर्पित हो। ऐसा भारत, जिसकी नई पीढ़ी आधुनिक ज्ञान और कौशल के साथ अपनी संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रीय मूल्यों से भी गहराई से जुड़ी हो। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि अच्छे नागरिक और जिम्मेदार मनुष्य का निर्माण भी है।
150 वर्ष बाद भी आज के समय में ‘वंदे मातरम्’ की प्रासंगिकता पर झा ने कहा कि इसकी प्रासंगिकता इसलिए बनी हुई है क्योंकि इसका मूल भाव मातृभूमि के प्रति श्रद्धा और राष्ट्र के प्रति समर्पण है। आज राष्ट्र निर्माण के सामने अनेक महत्वपूर्ण दायित्व हैं—पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता, स्वावलंबन, नागरिक कर्तव्यों का पालन और अपनी संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा के प्रति सम्मान। इसलिए ‘वंदे मातरम्’ केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान के कर्तव्य और भविष्य की प्रेरणा भी है।
विद्यार्थियों के लिए वंदे मातरम् के 150वें वर्ष पर एक संदेश देने के सवाल पर झा ने कहा, “वंदे मातरम् केवल गाइए नहीं, इसे अपने जीवन में उतारिए। अपनी मातृभूमि से प्रेम कीजिए, अपनी संस्कृति को जानिए, प्रकृति की रक्षा कीजिए, समाज के प्रति संवेदनशील बनिए और अपने ज्ञान, चरित्र एवं कर्म से भारत को गौरवशाली बनाने में अपना योगदान दीजिए।”
वंदे मातरम् के 150 वर्ष का यह अवसर झा के अनुसार केवल इसकी ऐतिहासिक यात्रा को स्मरण करने तक सीमित नहीं है, बल्कि मातृभूमि के प्रति श्रद्धा, राष्ट्रीय कर्तव्यों और नई पीढ़ी के संस्कारों से जुड़े मूल्यों को समझने और उन्हें जीवन में उतारने का अवसर भी है।