बारां डोल मेले में देर रात तक गूंजे कविता के स्वर, सड़क की आत्मकथा से किसान की पीड़ा तक
बारां के ऐतिहासिक डोल मेले में कवि सम्मेलन में सड़क की आत्मकथा, किसान की पीड़ा, हास्य और व्यंग्य की प्रस्तुतियों ने देर रात तक बांधे रखा।
तस्वीर में बारां के डोल मेले के रंगमंच पर कवि कविता पाठ करते हुए नजर आ रहे हैं।
ऐतिहासिक डोल मेले का रंगमंच गुरुवार की रात कविता, हास्य, व्यंग्य और संवेदनाओं से सराबोर रहा। स्थानीय कवि सम्मेलन में शहर के उभरते और स्थापित कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से ऐसा समां बांधा कि देर रात तक श्रोता अपनी जगहों पर डटे रहे। कभी ठहाकों की गूंज सुनाई दी तो कभी संवेदनशील रचनाओं ने श्रोताओं को भावुक कर दिया। कवियों की प्रस्तुतियों पर तालियों की गड़गड़ाहट से रंगमंच लगातार गूंजता रहा।
कवि सम्मेलन की शुरुआत सरस्वती वंदना के साथ हुई। तेजपाल पटवारी ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत कर काव्य संध्या की आधारशिला रखी। इसके बाद एक के बाद एक कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ करते हुए श्रोताओं को देर रात तक बांधे रखा।
कवि सुनील शर्मा ने लगातार बढ़ रही सड़क दुर्घटनाओं को अपनी कविता में पिरोते हुए सड़क की आत्मकथा प्रस्तुत की। उनकी पंक्तियां, "मैं सड़क हूं भोली, पर कड़क हूं", श्रोताओं को खूब प्रभावित करती नजर आईं। कविता के माध्यम से उन्होंने वाहन चालकों को सड़क पर सावधानी बरतने और यातायात नियमों का पालन करने का संदेश दिया।
इसके बाद हरिओम राठौर ने वीर रस की रचना "मुं चाहूं तो झंडो गाड़ दूं दुश्मन की छाती प, पग मल्यो चेतक न, जो मानसिंह का हाथी प" सुनाकर माहौल में जोश भर दिया।
हास्य कवि मनोज मस्त ने आज के युवा वर्ग और बदलते प्रेम के अर्थ पर चुटीले अंदाज में कटाक्ष किया। उनकी रचना "आजकल छोरा-छोरी प्यार में अंधा हो रया छ" ने श्रोताओं को खूब गुदगुदाया और देर तक ठहाके गूंजते रहे।
वहीं, शायर वाहिद बारनवी सम्मेलन में डायमंड बनकर उभरे। उन्होंने अपनी रचना "परिंदे हुए सयाने, उड़ गए अपने आशियाने से" के माध्यम से बदलते दौर में माता-पिता की पीड़ा और घरों से दूर होते बच्चों की संवेदनाओं को सामने रखा।
मेवाराम चौधरी ने युवाओं को प्रेरणा देते हुए कहा, "सपने पूरे करने हों तो मेहनत करनी पड़ती है, मेहनत करने से भी पहले हिम्मत करनी पड़ती है।" उनकी रचना ने युवाओं को मेहनत और संघर्ष का संदेश दिया।
राजेश तिरंगा ने "कितने सांचों में ढलकर आए हैं, ख्वाब की तरह पलकर आए हैं" सुनाकर कवि सम्मेलन को ऊंचाई दी। वहीं, राजेश पंकज रंगीला ने राजनीति पर व्यंग्य करते हुए "जब भी चुनाव आए नेताओं के चेहरे खिल गए, कोई चुपके मौज उड़ाए, कोई खुल्लम-खुल्ला खाए हैं" जैसी पंक्तियों के जरिए व्यंग्य बाण चलाए और कवि सम्मेलन का शिखर कलश रखा।
कवि सूरजमल मियाड़ा ने किसान की व्यथा को अपनी रचना में आवाज दी। "करसान भोला, कुण जाणे रे थारी पीड़ा" की प्रस्तुति ने श्रोताओं के मन को छू लिया।
कवि सम्मेलन का प्रभावी संचालन बछराज राजस्थानी ने किया, जबकि अध्यक्षता राधेश्याम राष्ट्रवादी ने की। सम्मेलन में रमन अजमेरा, जितेंद्र साहू, हरिशंकर शर्मा, राज प्रमोद राज, ओमप्रकाश शास्त्री, गिर्राज भारतवासी, हरिश्चंद्र सेन, ब्रजराज प्रजापति, सुरेश चक्रधारी, रोहित दाधीच, हेमराज बंसल, महेंद्र कुमार बेरवा, सतनारायण शर्मा, गजेंद्र यादव, हीरालाल कुमोलिया, मुकेश गौतम, हरिओम राठौर, ओमप्रकाश केवट और देवीशंकर गुर्जर सहित अनेक कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया।
डोल मेला रंगमंच के मीडिया प्रभारी लक्ष्मण वर्मा सागर ने बताया कि कार्यक्रम के प्रारंभ में डोल मेला अध्यक्ष नीरज नागर ने सभी वार्ड पार्षदों के साथ सरस्वती पूजन किया। इसके बाद नगर परिषद थर्ड फ्रंट के पार्षद नरेश सुमन, गजेंद्र नागर, गिरीश मेहरा, प्रशांत गौतम सहित अन्य जनप्रतिनिधियों ने आमंत्रित कवियों और दो दर्जन से अधिक प्रबुद्धजनों का माल्यार्पण कर स्वागत किया।
डोल मेला अध्यक्ष नीरज नागर ने बताया कि शनिवार की रात को ढोल मेल रंगमंच पर राजस्थानी कवि सम्मेलन आयोजित किया जाएगा।