तस्वीर में एक बुजुर्ग व्यक्ति खड़े हैं और पास में कोर्ट की हथौड़ी रखी है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने बहराइच के करीब 29 साल पुराने हत्या मामले में निचली अदालत की ओर से सुनाई गई उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए अभियुक्त सांभर चाई को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने माना कि मामला पूरी तरह परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था, लेकिन अभियोजन पक्ष ऐसी मजबूत और विश्वसनीय कड़ियां साबित नहीं कर सका, जो अभियुक्त के अपराध को संदेह से परे स्थापित कर सकें। न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान तथा न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्र की खंडपीठ ने सांभर चाई की अपील स्वीकार करते हुए, किसी अन्य मामले में वांछित नहीं होने की स्थिति में उसे तत्काल जेल से रिहा करने का निर्देश दिया।

मामला बहराइच जिले के हुजूरपुर थाने में वर्ष 1997 में दर्ज हुए मुकदमे से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार रामबहोर 20 फरवरी 1997 को अचानक लापता हो गया था। आरोप था कि सांभर चाई और उसके अन्य साथियों ने मिलकर गला दबाकर रामबहोर की हत्या की और साक्ष्य छुपाने के उद्देश्य से शव को नदी किनारे रेत में दफना दिया। घटना के करीब 26 दिन बाद 19 मार्च 1997 को मामले की एफआईआर दर्ज कराई गई। इसके अगले दिन पुलिस ने शव बरामद किया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण गला घोंटना बताया गया था।

मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने सांभर चाई को हत्या और साक्ष्य मिटाने का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हालांकि, अन्य सह-आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए पहले ही बरी कर दिया गया था। ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ सांभर चाई ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।

अपील पर सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट की पीठ ने अभियोजन के दावों में कई गंभीर खामियां पाईं। अभियोजन का मुख्य आधार शिकायतकर्ता के बहनोई बुद्धिसागर का बयान था। बुद्धिसागर ने दावा किया था कि अभियुक्त ने उसके सामने अपराध स्वीकार किया था। अदालत ने इस कथित स्वीकारोक्ति की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए कहा कि अभियुक्त और गवाह के बीच ऐसा कोई आत्मीय संबंध या विश्वास का आधार नहीं था, जिसके चलते घटना के एक महीने बाद अभियुक्त उसके सामने जाकर अपना गुनाह कबूल करता।

शव की बरामदगी को लेकर भी अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। मामले में विधिवत 'बरामदगी मेमो' पेश नहीं किया गया था। इसके अलावा मामले का मुख्य विवेचक अदालत में गवाही देने तक नहीं आया। पुलिस दस्तावेजों को हेड कांस्टेबल के जरिए द्वितीयक साक्ष्य के रूप में साबित कराया गया।

हाई कोर्ट ने कहा कि जब कोई मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित हो, तो उसकी सभी कड़ियां इतनी मजबूत होनी चाहिए कि अभियुक्त के निर्दोष होने की कोई गुंजाइश न बचे। अदालत के अनुसार इस मामले में न तो कथित स्वीकारोक्ति साबित हो सकी, न शव की कानूनी बरामदगी स्थापित हुई और न ही हत्या के पीछे कोई स्पष्ट उद्देश्य सामने आया।

इन कानूनी पहलुओं और साक्ष्यों की कमियों को देखते हुए हाई कोर्ट ने सांभर चाई की अपील स्वीकार कर ली और उम्रकैद की सजा रद्द करते हुए उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया। पीठ ने निर्देश दिया कि यदि सांभर चाई किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत जेल से रिहा किया जाए।

Tags: