निम्बाहेड़ा निकाय चुनाव: निर्विरोध सभापति चयन के बाद गरमाई राजनीति
शिल्पा भूतड़ा के निर्विरोध सभापति बनने के बाद पर्दे के पीछे की सियासी रणनीतियों और नए समीकरणों पर चर्चा तेज हो गई है।
निम्बाहेड़ा नगर निकाय चुनाव के नतीजों के बाद यहां की राजनीतिक फिजाओं में अजीब सी खामोशी है, लेकिन इस खामोशी के भीतर सियासी सरगर्मियों का ऐसा बवंडर छिपा है, जिसने चुनावी समीकरणों को चर्चा में ला दिया है। चुनाव के दिलचस्प घटनाक्रम में हर किरदार ने अपनी भूमिका निभाई और पर्दे के पीछे चली सियासी रणनीतियों ने कई सवाल खड़े किए हैं।
चुनाव के दौरान लम्बू और छोटू की जुगलबंदी ने सबको हैरान कर दिया। भले ही बोर्ड दोनों में से किसी एक का ही बना हो, लेकिन दोनों ने अपनी मजबूत रणनीति के दम पर अपने कई वफादार पार्षदों को जीत दिलाई। इससे यह बात सामने आई कि निम्बाहेड़ा की साइलेंट राजनीति को कम आंकना आसान नहीं है।
दूसरी ओर, चुनावी रण में 'बच्चन साहब' ने ऐसी बिसात बिछाई कि उनके हर चहेते को टिकट मिल गया। इस मास्टरस्ट्रोक से चेहरों पर खुशी दिखाई दी, लेकिन इस मुस्कान के पीछे एक सोची-समझी राजनीतिक पटकथा भी छिपी थी।
इस बार सीट महिला आरक्षित होने के कारण कई वरिष्ठ नेत्रियों के राजनीतिक भविष्य का 'बलिदान' देना पड़ा। बच्चन साहब को जिस मोहरे की जरूरत थी, वह शिल्पा भूतड़ा के रूप में मिला। उन्हें सभापति निर्विरोध चुनवाकर बच्चन साहब ने अपनी जीत की इबारत लिख दी। परिवार के मुखिया ने भले ही रास्ट्रीय धव्ज को उल्टा फहरा दिया हो, लेकिन भारतीय जनता पार्टी का कमल धव्ज सही फहरा दिया।
पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प पहलू छोटू की वफादारी रही। छोटू ने लम्बू से किया अपना हर वादा पूरी शिद्दत से निभाया। राजनीति का यह "तू-डाल-मैं-पात-पात" वाला खेल निम्बाहेड़ा में हमेशा इसी अंदाज में चलता आया है।
इन तमाम सियासी उठापटक के बीच जब मौन साधे बैठे 'मुकेश्या नंद महाराज' (बाबाजी) का स्मरण किया गया तो वे मुस्कुराते हुए प्रकट हुए और बोले, "वत्स! छोटू और लम्बू बेटा... पूरे जिले में अगर कहीं असली साइलेंट और शातिर राजनीति होती है, तो वह सिर्फ निम्बाहेड़ा की धरती पर होती है। और इसका ट्रेलर-पिक्चर सब तुमने अपनी आँखों से देख ही लिया है!"
राजनीति के इस अखाड़े में कुर्सी किसी की भी हो, लेकिन असली खिलाड़ी वही है जो पर्दे के पीछे से डोर हिलाना जानता हो। निम्बाहेड़ा नगर निकाय चुनाव के बाद सामने आया यह सियासी घटनाक्रम इसी पर्दे के पीछे चलने वाली रणनीति और चुनावी समीकरणों को चर्चा के केंद्र में ले आया है।