तस्वीर में खेरोदा में आयोजित धर्मसभा के दौरान मेवाड़ प्रवर्तक कोमल मुनि श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए नजर आ रहे हैं।

खेरोदा, 02 अक्टूबर 2026। खेरोदा कस्बे में चल रहे चातुर्मास के दौरान मेवाड़ प्रवर्तक कोमल मुनि ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन में सुख-दुःख, धूप-छांव और उतार-चढ़ाव का आना-जाना स्वाभाविक है। इन परिस्थितियों के बीच मनुष्य की दृष्टि और साधना सदैव समभाव की होनी चाहिए।

कोमल मुनि ने कहा कि सांसारिक सुख और दुःख दोनों क्षणभंगुर हैं, शाश्वत नहीं हैं। इनसे आत्मा को कोई वास्तविक लाभ नहीं मिलता। जिस प्रकार प्रकृति में सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों का अपना क्रम है, उसी प्रकार मनुष्य को भी हर परिस्थिति में एक समान रहने की कला सीखनी चाहिए। हर स्थिति में समता धारण करना ही प्रभु का सच्चा संदेश है।

परोपकार और सेवा को वास्तविक धर्म बताते हुए मुनिजी ने कहा कि दूसरों को प्रसन्न देखकर सुखी होना और उनके दुःखों को दूर कर स्वयं को हल्का महसूस करना ही सच्ची इंसानियत है। दूसरों की चिंता करना और निःस्वार्थ भाव से सेवा करना ही जीवन का वास्तविक धर्म है। सुख और दुःख जीवन के अभिन्न अंग हैं, लेकिन आत्मा की साधना सर्वोपरि है। जिस प्रकार ऋतुओं के अनुकूल आचरण आवश्यक है, उसी प्रकार संयम और नियमों को जीवन में आत्मसात कर व्यक्ति सही मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।

धर्मसभा में अध्ययनशील, सेवारत्न हर्षित मुनि ने विनय के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जो व्यक्ति विनयवान और शालीन होता है, उसका यश और कीर्ति दसों दिशाओं में फैलती है। इसके विपरीत, अविनय और अहंकार से भरा व्यक्ति हर जगह तिरस्कृत होता है और उसका जीवन सारहीन बनकर रह जाता है। उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति से जीवन में विनम्रता का गुण अपनाने की बात कही।

इस दौरान वर्द्धमान जैन श्रावक संघ अध्यक्ष सुनील कूकड़ा ने आगंतुक अतिथियों का स्वागत किया। धर्मसभा में कोमल मुनि के प्रवचन में समभाव, परोपकार, सेवा, संयम और विनय को जीवन के महत्वपूर्ण आधार के रूप में रेखांकित किया गया।

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