खंडित जैन प्रतिमाएं जवास मंदिर संग्रहालय में सुरक्षित, 15वीं-17वीं सदी की मानी गईं
खेरवाड़ा के ऋषभदेव और पीपली स्थित जैन मंदिरों से प्राप्त खंडित प्रतिमाओं को जवास के संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया। इनमें पार्श्वनाथ, मुनिसुव्रतनाथ, आदिनाथ और वासुपूज्य की प्रतिमाएं शामिल हैं।
तस्वीर में जवास स्थित आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर के प्रांगण में ट्रस्ट मंडल के सदस्य और प्राचीन खंडित प्रतिमाएं नजर आ रही हैं।
खेरवाड़ा। महावीर नगर ऋषभदेव स्थित श्री 1008 महावीर दिगंबर जैन मंदिर एवं पीपली स्थित श्री 1008 शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर से प्राप्त खंडित जैन प्रतिमाओं को आदिनाथ ट्रस्ट मंडल जवास के सदस्यों ने जवास स्थित श्री 1008 आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर के ‘अतीत के अक्षर-आस्था की धरोहर’ संग्रहालय में सुरक्षित रखवाया।
इस दौरान दिगंबर जैन दसानरसिंहपुरा समाज ऋषभदेव के अध्यक्ष एवं मुख्य मार्गदर्शक भूपेंद्र कुमार वालावत, ट्रस्ट संरक्षक भूपेंद्र कोठारी, अध्यक्ष भरत जैन, महामंत्री सचिन जैन गनोडिया, उपाध्यक्ष मिथिलेश भंवरा, प्रतीक जैन, सुनील लूणदिया, धनपाल दोवड़िया सहित ट्रस्ट के सदस्य उपस्थित रहे।
प्रथम दृष्टया प्राप्त खंडित प्रतिमाओं में पार्श्वनाथ भगवान, मुनिसुव्रतनाथ भगवान, आदिनाथ भगवान एवं वासुपूज्य भगवान की प्रतिमाएं मानी जा रही हैं। इन प्रतिमाओं के करीब 15वीं से 17वीं सदी के मध्य की होने का अनुमान है। बताया गया कि ये प्रतिमाएं कारछा, पादेड़ी एवं पीपली स्थित प्राचीन मंदिरों से संबंधित मानी जा रही हैं।
जवास स्थित आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर (सौभाग्यधाम) में जैन धर्म की खंडित प्रतिमाओं एवं प्राचीन अवशेषों को संरक्षित रखने के उद्देश्य से संग्रहालय का निर्माण किया गया है। संग्रहालय में धीरे-धीरे प्राचीन प्रतिमाओं एवं अवशेषों की संख्या बढ़ रही है। इससे यहां आने वाले यात्रियों में जैन धर्म की प्राचीन विरासत एवं इतिहास को जानने के प्रति उत्सुकता बढ़ रही है।