कोमल मुनि: जीवन में सम्यक् ज्ञान और आचरण का महत्व
खेरोदा में चातुर्मास के दौरान मेवाड़ प्रवर्तक कोमल मुनि ने कहा कि सम्यक् ज्ञान पुस्तकों तक सीमित न रहकर जीवन में दिखना चाहिए।
खेरोदा में आयोजित चातुर्मास के दौरान मेवाड़ प्रवर्तक कोमल मुनि ने धर्मसभा को संबोधित किया।
खेरोदा कस्बे में चल रहे चातुर्मास के दौरान मेवाड़ प्रवर्तक पूज्य कोमल मुनि म.सा. ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सम्यक् ज्ञान का महत्व तभी सार्थक है, जब वह पुस्तकों और सिद्धांतों तक सीमित रहने के बजाय व्यक्ति के जीवन और आचरण में भी दिखाई दे। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार किसी राज्य या नगर की सुव्यवस्था के लिए राजा का होना आवश्यक है, उसी प्रकार जीवन रूपी शासन को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए 'सम्यक्' का होना अनिवार्य है। इसके अभाव में आध्यात्मिक प्रगति की गति रुक जाती है।
मुनिश्री ने वर्तमान परिवेश की परिस्थितियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज संसार की गतिविधियों में अत्यधिक तनाव व्याप्त है। इस तनाव और उलझनों के बीच जीव अपनी आत्मा को ही भूलता जा रहा है। ऐसी स्थिति में वीतरागता ही सही दिशा दिखाने वाला मार्ग है। इस मार्ग पर चलकर अल्पकालीन मानव जीवन को भी भगवान के समान महान बनाया जा सकता है। उन्होंने सांसारिक प्रलोभनों से दूर रहने की सीख देते हुए कहा कि ऐसे प्रलोभन व्यक्ति को वीतरागता के मार्ग से भटका देते हैं।
सेवा और साधना के लिए स्वस्थ शरीर को धर्म की धुरी बताते हुए कोमल मुनि ने कहा कि संयम की साधना तथा श्रद्धा-चरण के दृढ़ संकल्प से शारीरिक और मानसिक रोगों को दूर किया जा सकता है। हंस और बगुले का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रकार हंस मोती चुनता है, जबकि बगुला कीचड़ में रहता है, उसी प्रकार मनुष्य को भी जीवन सार्थक बनाने के लिए विकारों के बजाय सद्विचारों और पवित्रता का चयन करना चाहिए।
कर्मों के बंधन, चिंतन और सेवा-भाव का महत्व समझाते हुए मेवाड़ प्रवर्तक ने कहा कि प्रत्येक कार्य समय पर करना चाहिए और दूसरों को दोष देना बंद करना चाहिए, क्योंकि अज्ञानता ही सभी दुखों का मूल कारण है। उन्होंने श्रद्धालुओं को परोपकार की भावना अपनाने की प्रेरणा देते हुए कहा कि व्यक्ति को किसी के अंधकारमय जीवन में दीपक और मुरझाए हुए जीवन में मार्गदर्शक बनना चाहिए।
मुनिश्री ने स्पष्ट किया कि सद्गति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए सम्यक् दर्शन तथा जिनवाणी का आश्रय लेना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि हृदय का सच्चा प्रेम सभी व्यावहारिक और आध्यात्मिक कार्यों को मजबूती प्रदान करता है। हृदय में सच्चा प्रेम होने पर ही प्रभु के प्रति चिंतन गहरा होता है और यही प्रेम हर प्रकार की व्याधि को दूर करने की सामर्थ्य रखता है।
प्रवचन के समापन पर कोमल मुनि ने श्रद्धालुओं से सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन, उच्च चिंतन, आत्मपरक दृष्टि, सेवा-भाव, सच्चे प्रेम और समभाव को जीवन का आधार बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इन जीवन मूल्यों को अपनाकर ही मनुष्य अपने जन्म को सार्थक, पावन और मोक्षगामी बना सकता है।