तस्वीर में दिख रहे एक व्यक्ति नेहरू जैकेट पहने सामने की ओर देख रहे हैं।

संसार में मन से बड़ा बहुरूपी कोई नहीं है। वह पल-पल अपना रूप बदलता है, कभी खुशी के सपने दिखाता है तो कभी दुख के सागर में डुबो देता है। मन की यही चंचलता मनुष्य को जीवनभर भटकाती रहती है। इसलिए जीवन की सबसे बड़ी चुनौती संसार को जीतना नहीं, बल्कि अपने मन को जीतना है।

कहा गया है, "माया ममता में उलझा रहे वो, पड़ जाए जो मन के पाले।" जब मनुष्य मन के अधीन हो जाता है, तो वह मोह, माया, लोभ और ममता के जाल में उलझ जाता है। ऐसी स्थिति में उसे सही-गलत का भेद समझ नहीं आता। मन उसे तरह-तरह के प्रलोभन दिखाता है और व्यक्ति अपने लक्ष्य से भटक जाता है।

"मन के बहकावे में ना आ, मन राह भुलाए भ्रम में डाले।" यह पंक्ति आज के समय में और भी प्रासंगिक है। सोशल मीडिया और भौतिक सुख-सुविधाओं की दौड़ में मनुष्य लगातार भ्रमित हो रहा है। वह शांति बाहर खोजता है, जबकि शांति उसके भीतर है।

गीता में भी भगवान कृष्ण ने कहा है कि मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है। इसलिए संत कहते हैं, "तू इस मन का दास ना बन, इस मन को अपना दास बना ले।" मन को दास बनाना अर्थात मन पर नियंत्रण करना है। यह संयम, तप, त्याग और साधना तथा आत्मचिंतन से ही संभव है।

जब मनुष्य मन को साक्षी भाव से देखना सीख जाता है और उसके हर विचार पर तत्काल प्रतिक्रिया नहीं देता, तभी वह मन का स्वामी बनता है। जिसने मन को जीत लिया, उसने संसार को जीत लिया। भगवान महावीर स्वामी ने भी यही कहा, "संसार को जानने की जरूरत नहीं है स्वयं को जान लीजिये। संसार को नहीं जितना है स्वयं को जीत लीजिएगा।"

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