जलती हुई बस और निरीक्षण करते सुरक्षाकर्मी ग्रेटर नोएडा के यमुना एक्सप्रेसवे पर स्लीपर बस हादसे की भयावहता को बयां कर रहे हैं।

देशभर में स्लीपर बसों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर से बेहद गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं, क्योंकि हाल ही में एक ही दिन के भीतर देश के अलग-अलग हिस्सों में तीन बसों में आग लगने की खतरनाक घटनाएं सामने आई हैं। इन हादसों ने नए बस बॉडी कोड के पालन और कागजी नियमों की असलियत की पोल खोलकर रख दी है। जानकारों का कहना है कि गाड़ियों की फिटनेस की अनदेखी, छतों पर नियमों के खिलाफ लादा जाने वाला अवैध लगेज, लगातार सामने आ रहा इलेक्ट्रिकल फेलियर और बसों के अंदर इस्तेमाल होने वाला ज्वलनशील सामान यात्रियों की जान के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है।

बीते साल राजस्थान समेत देश के कई अन्य इलाकों में स्लीपर बसों में आग लगने की डरावनी घटनाओं में 100 से अधिक लोगों की दर्दनाक मौतें हुई थीं। उन हादसों के बाद केंद्रीय सड़क, परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी और उनके मंत्रालय ने लंबी मशक्कत के बाद 1 सितंबर से नया बस बॉडी कोड लागू किया था, जिसे सुरक्षा का इंटरनेशनल स्टैंडर्ड बताया गया था। लेकिन सवाल यह है कि आखिर उन कड़े नियमों का क्या हुआ? ताजा मामलों में यमुना एक्सप्रेसवे समेत देश के विभिन्न हिस्सों में एक ही दिन में तीन बसें आग की चपेट में आ गईं। इनमें से सबसे बड़ा और भीषण हादसा ग्रेटर नोएडा इलाके में यमुना एक्सप्रेसवे पर हुआ, जहां एक स्लीपर बस अचानक आग का गोला बन गई और उसमें जिंदा जलकर 9 यात्रियों की दर्दनाक मौत हो गई। इसके अलावा मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे और हैदराबाद में श्रीशैलम जा रही चलती बस में भी आग लगने की घटनाएं घटीं, हालांकि गनीमत यह रही कि इन दोनों मामलों में किसी की जान नहीं गई।

घटनास्थल की तस्वीरों और शुरुआती रिपोर्ट्स से साफ पता चलता है कि उस बस की छत पर भी भारी मात्रा में लगेज भरा हुआ था, जो कि परिवहन नियमों के बिल्कुल खिलाफ है। इस बस की फिटनेस कब और कैसे हुई थी, यह तो विस्तृत जांच के बाद ही पूरी तरह सामने आ सकेगा। लेकिन परिवहन एक्सपर्ट्स का कहना है कि सरकार की ओर से नियम तो कड़े बना दिए जाते हैं, पर जमीनी स्तर पर उनका सख्ती से पालन नहीं हो पाता है। यही वजह है कि तमाम बस ऑपरेटर्स बेखौफ होकर नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए अपनी बसों को सड़कों पर दौड़ा रहे हैं। स्लीपर बसों की छतों पर भारी सामान लादकर ये बसें दिल्ली से उत्तर प्रदेश और हरियाणा होते हुए आगे के लंबे सफर पर निकल जाती हैं। हैरानी की बात यह है कि रास्ते में न तो इन्हें रोकने वाला कोई ट्रांसपोर्ट विभाग का अधिकारी होता है और न ही ट्रैफिक पुलिस। नियम तोड़ती ये बसें धड़ल्ले से रफ्तार भर रही हैं।

इस पूरे मामले पर जानकारों और ट्रांसपोर्ट एक्सपर्ट्स का मानना है कि बीएस-6 (BS-6) तकनीक वाली गाड़ियों के आने के बाद से शॉर्ट सर्किट और आग लगने की घटनाएं काफी बढ़ गई हैं। इसके पीछे मुख्य वजह इन बसों में इलेक्ट्रिकल फेलियर होना है। सड़क पर गुजरने वाली गाड़ियों को रोककर उनकी जांच करने वाले स्टेट ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट के इंस्पेक्टर हों या फिर आरटीओ के एक्सपर्ट्स, किसी के पास भी इस तरह के इलेक्ट्रिकल ऑडिट की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है। जाने-माने ट्रांसपोर्ट एक्सपर्ट अनिल छिकारा के अनुसार, जब से बीएस-6 गाड़ियां सड़कों पर उतरी हैं, तब से शॉर्ट सर्किट के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। आग का गोला बनने वाली यह स्लीपर बस भी बीएस-6 मॉडल की ही थी, और प्राथमिक तौर पर यही अंदेशा जताया जा रहा है कि यह हादसा भी इलेक्ट्रिकल फेलियर की वजह से ही हुआ, जिसमें पहले अंदर की सारी वायरिंग जल गई और फिर पलभर में बस ने विकराल रूप ले लिया।

दिल्ली इंटर स्टेट Bus Operators संघ के महासचिव श्याम लाल गोला का कहना है कि इस तरह के हादसों के लिए केवल ऑपरेटर ही नहीं, बल्कि बस बनाने वाली कंपनियों, बस बॉडी निर्माताओं और उनमें एसी फिट करने वाली कंपनियों की भी पूरी जवाबदेही तय की जानी चाहिए। अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि हकीकत में हो यह रहा है कि बसों की फिटनेस को पूरी तरह ताक पर रखकर उन्हें सड़कों पर चलाया जा रहा है। तय समय सीमा बीत जाने के बाद भी उनकी समय पर सर्विसिंग नहीं कराई जाती है। इसके अलावा बसों के इंटीरियर में इतना अधिक ज्वलनशील मटेरियल इस्तेमाल किया जाता है कि थोड़ा सा भी शॉर्ट सर्किट होते ही बस कुछ ही मिनटों में आग का भयानक गोला बन जाती है। विशेषज्ञों की मांग है कि अनिवार्य रूप से बसों का इलेक्ट्रिकल ऑडिट होना चाहिए ताकि यह जांचा जा सके कि गाड़ियों के अंदर की गई वायरिंग सुरक्षा के मानकों पर खरी उतरती है या नहीं, लेकिन फिलहाल देश में ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है।