बिजली के ट्रांसमिशन टॉवर और हाइड्रोपावर डैम का यह दृश्य भारत और नेपाल के बीच ऊर्जा व्यापार और बढ़ती मांग के संदर्भ को दर्शाता है।

अगले दशक में भारत की बिजली की मांग दोगुनी होने का अनुमान है, लेकिन नेपाल यह मानकर नहीं चल सकता कि वह हमेशा उसकी पनबिजली के लिए एकमात्र कैप्टिव बाजार बना रहेगा। नेपाल लंबे समय से भारत को बिजली बेचता आ रहा है और भारत उसके लिए एक भरोसेमंद और अकेला ग्राहक रहा है। आने वाले वर्षों में भारत की बिजली की मांग में भारी बढ़ोतरी की उम्मीद है, जिससे नेपाल को अपनी बिजली आसानी से बेचने की उम्मीद है। हालांकि, नेपाल के एनर्जी एक्सपर्ट्स का मानना है कि काठमांडू को भारतीय बाजार को हल्के में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि वहां ऊर्जा क्षेत्र में बड़े बदलाव हो रहे हैं।

द काठमांडू पोस्ट के विश्लेषण के अनुसार, नेशनल जेनरेशन एडिक्वेसी प्लान का अनुमान है कि 2036 तक भारत में बिजली की पीक डिमांड 458.7 GW तक पहुंच सकती है। इसके साथ ही भारत की कुल स्थापित क्षमता 520.5 GW से बढ़कर 1,121 GW होने की उम्मीद जताई गई है। भारत सरकार 2047 तक 100 GW परमाणु ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में भी तेजी से काम कर रही है। भारत अपनी बढ़ती घरेलू मांग को पूरा करने के लिए केवल एक स्रोत पर निर्भर नहीं है, बल्कि वह सोलर, विंड, हाइड्रोपावर, बैटरी स्टोरेज, पंप-स्टोरेज प्रोजेक्ट और परमाणु ऊर्जा जैसे तमाम क्षेत्रों में भारी निवेश कर रहा है। इन विविध ऊर्जा स्रोतों को अपनाने की वजह से भविष्य में भारतीय खरीदार नेपाल से बिजली खरीदने के मामले में बहुत सोच-समझकर और रणनीतिक फैसले ले सकते हैं।

विशेष रूप से परमाणु ऊर्जा और अन्य नवीकरणीय स्रोतों का तेजी से विस्तार नेपाल के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। नेपाल के पूर्व ऊर्जा मंत्री कुलमान घिसिंग का कहना है कि सरकार को बिजली के बाजार को सुरक्षित करने के लिए बेहद गंभीरता से कदम उठाने होंगे। इसमें नए हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स के विकास के साथ-साथ क्रॉस-बॉर्डर ट्रांसमिशन लाइनों का विस्तार और बिजली का समय पर निर्यात शामिल है। घिसिंग का सुझाव है कि अब नेपाल को विभिन्न परियोजनाओं के लिए भारत या बांग्लादेश के साथ 5, 15 और 25 साल के दीर्घकालिक समझौतों पर ध्यान केंद्रित करने की सख्त आवश्यकता है।

जानकारों का मानना है कि अकेले भारतीय बाजार पर अत्यधिक निर्भर रहने से कई तरह के भू-राजनीतिक जोखिम पैदा हो सकते हैं। यदि भविष्य में दोनों देशों के आपसी संबंधों में किसी प्रकार का उतार-चढ़ाव आता है, तो भारत की घरेलू उत्पादन क्षमता उसे यह लचीलापन देगी कि वह यह तय कर सके कि नेपाल से बिजली कब और कितनी मात्रा में खरीदी जाए। चूंकि भारत अपनी सौर, पवन, जल-विद्युत और ऊर्जा-भंडारण क्षमताओं का लगातार विस्तार कर रहा है, इसलिए वह कीमत, भरोसेमंदता और उपलब्धता के आधार पर नेपाली बिजली का कड़ा मूल्यांकन करेगा। यही कारण है कि काठमांडू के विशेषज्ञ नेपाल को सलाह दे रहे हैं कि वह लंबे समझौतों के जरिए भारतीय बाजार को सुरक्षित करने के साथ-साथ अन्य देशों में भी अपने निर्यात का दायरा बढ़ाए।

एक रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया गया है कि यदि नेपाल अपनी पनबिजली क्षमता का पूरी तरह से उपयोग करके भारत को बिजली बेचता है, तो वह 2030 तक सालाना 310 अरब रुपये और 2045 तक सालाना 1.069 ट्रिलियन रुपये की रिकॉर्ड कमाई कर सकता है। इस मुकाम को हासिल करने के लिए नेपाल को 2030 तक भारत को 13 GW बिजली निर्यात करनी होगी और 2045 तक इस क्षमता को दोगुना करना होगा। हालांकि, इसमें एक बड़ा पेंच यह है कि भारत नॉन-फॉसिल फ्यूल पर आधारित जनरेशन क्षमता को 70 प्रतिशत तक ले जाने और सोलर पावर को बड़ा हिस्सा बनाने पर जोर दे रहा है। जानकारों का कहना है कि भारत का यह तीव्र विस्तार भविष्य में नेपाली हाइड्रोपावर के बाजार पर गहरा दबाव डाल सकता है।

IPPAN के पूर्व वाइस-प्रेसिडेंट आशीष गर्ग ने चेतावनी देते हुए कहा है कि दुनिया केवल हाइड्रोपावर बिजली का इंतजार नहीं करती रहेगी, इसलिए नेपाल को अब बिना देर किए तेजी से कदम बढ़ाने होंगे। नेपाल केवल इसलिए हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकता कि उसके पास उत्पादन के लिए 30 या 35 साल के लाइसेंस मौजूद हैं। नेपाल सो रहा है जबकि बाकी दुनिया इस दौड़ में काफी आगे निकल चुकी है। नेपाल के सामने आज असली चुनौती यह नहीं है कि वह कितनी बिजली पैदा कर सकता है, बल्कि असली चुनौती यह है कि क्या वह समय पर ट्रांसमिशन नेटवर्क का निर्माण कर सकता है, दीर्घकालिक खरीदार ढूंढ सकता है और अपनी जलविद्युत को प्रतिस्पर्धी बना सकता है।

विशेषज्ञों ने नेपाल की बालेन शाह सरकार को स्पष्ट चेतावनी दी है कि भले ही आने वाले कई वर्षों तक भारत नेपाल के लिए बिजली का सबसे बड़ा बाजार बना रहे, लेकिन इस बाजार को सुरक्षित करने का सुनहरा मौका हमेशा के लिए खुला नहीं रहेगा। भारत के बदलते एनर्जी मिक्स और तेजी से विकसित होते वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के कारण नेपाल के विकल्प भविष्य में सीमित हो सकते हैं, जिससे समय रहते ठोस कदम उठाना अनिवार्य हो गया है।