सरहद की दीवारें हारीं, प्यार जीता: ऑपरेशन सिंदूर के बाद फ्लाइट्स से भारत पहुंचीं 150 पाकिस्तानी दुल्हनें|
ऑपरेशन सिंदूर के बाद बॉर्डर बंद होने के कारण पाकिस्तान से मस्कट और दुबई के रास्ते 150 दुल्हनें भारत आईं।
इस प्रतीकात्मक कोलाज तस्वीर में हवाई यात्रा, पाकिस्तानी पासपोर्ट, भारत-पाकिस्तान के साथ पाकिस्तानी दुल्हनों के भारत आने का दृश्य दिखाया गया है|
पाकिस्तान के साथ सरहद पर बदले राजनीतिक और सामरिक समीकरणों ने कई परिवारों की खुशियों पर जैसे ग्रहण सा लगा दिया था, लेकिन कहते हैं कि सच्ची चाहत और उम्मीद की डोर हर मुश्किल दीवार को गिरा देती है। अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले और उसके बाद भारत सरकार द्वारा चलाए गए 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद दोनों देशों के बीच के हालात पूरी तरह से बदल गए। इस गंभीर घटनाक्रम के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान से जुड़ने वाले सभी जमीनी रास्तों और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को सील कर दिया, जिसमें ऐतिहासिक वाघा-अटारी बॉर्डर भी शामिल था। इस महत्वपूर्ण और कड़े फैसले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच आवाजाही के रास्ते पूरी तरह बंद हो गए, जिससे सरहद के दोनों तरफ बैठे उन तमाम परिवारों की सांसें अटक गईं जिनकी शादियां तय हो चुकी थीं या रिश्ते जुड़ चुके थे। तनाव और अनिश्चितता के इस माहौल में एक-दूसरे देश में जाकर शादी करने की उम्मीदें लगभग धूमिल हो चुकी थीं और लंबा इंतजार ही एकमात्र विकल्प बचा था।
इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच कई ऐसे मामले सामने आए जहां खुशियों के पल अनिश्चित काल के लिए टल गए। लंबे समय के वीजा पर भारत में रह रहे इंकेश जशनानी की सगाई 'ऑपरेशन सिंदूर' से ठीक पहले हुई थी और उन्होंने पिछले साल ही शादी करने का पूरा प्लान बना लिया था। उनकी होने वाली पत्नी आरती, सिंध के खानपुर तहसील से एक बेहद मुश्किल और संघर्षपूर्ण सफर तय करके मई 2025 में वाघा बॉर्डर तक जा पहुंची थीं, और वे उस अंतरराष्ट्रीय द्वार से सिर्फ एक किलोमीटर की दूरी पर थीं। लेकिन ठीक उसी वक्त भारत सरकार ने सुरक्षा कारणों से अटारी गेट पूरी तरह से बंद कर दिया, जिससे आरती को बीच रास्ते से ही मायूस होकर लौटना पड़ा या अनिश्चितता के साये में जीना पड़ा। इसी तरह, भारतीय नागरिकता हासिल करने के बाद नागपुर में रहने वाले संजय कलानी की सगाई तीन साल पहले सिंध के घोटकी जिले की रहने वाली काजल से हुई थी। उनकी शादी भी पिछले साल ही तय थी, लेकिन 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद उपजे तनाव ने काजल और उनके परिवार के लिए भारत आने के सारे रास्ते बंद कर दिए। उस दौरान का यह लंबा इंतज़ार दोनों परिवारों के लिए कभी न खत्म होने वाला एक भयानक सपना जैसा बन गया था।
तनाव और निराशा के इस दौर में करीब डेढ़ साल का एक लंबा और पीड़ादायक अंतराल बीता, लेकिन आखिरकार उम्मीदों का सूरज फिर से निकला और सरहद पार की दूरियां दिलों के जरिए कम होने लगीं। गृह मंत्रालय ने सिंध के एक बेहद सम्मानित और ऐतिहासिक धार्मिक स्थल के साथ मिलकर इन विशेष यात्राओं के लिए नियमों में कुछ ढील दी और विशेष छूट प्रदान की। चूंकि जमीनी रास्ते यानी वाघा-अटारी बॉर्डर पूरी तरह से सील था, इसलिए पाकिस्तानी दुल्हनों और उनके परिजनों ने हवाई मार्ग का सहारा लिया। रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 150 पाकिस्तानी दुल्हनें मस्कट, कोलंबो, ढाका, दुबई और कतर जैसे देशों से कनेक्टिंग फ्लाइट्स लेकर भारत की भूमि पर उतरीं। वे नागपुर, जोधपुर, अहमदाबाद, रायपुर, पुणे और भोपाल जैसे प्रमुख भारतीय शहरों में पहुंचीं और वहां पारंपरिक तथा सादगी भरे माहौल में अपनी शादी की सभी रस्मों को पूरा किया। वीजा नियमों और सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत पाकिस्तानी रिश्तेदारों को दुल्हन के साथ भारत आने की अनुमति तो दी गई थी, लेकिन उनके लिए एक तय समयसीमा के भीतर वापस लौटना अनिवार्य था, जिसके चलते ये सभी विवाह बेहद सादगी और शालीनता के साथ संपन्न हुए।
इन अनूठी शादियों की फेहरिस्त में कई और नाम भी शामिल हैं, जिन्होंने इस कठिन सफर को तय किया। संजय कलानी के भाई धीरज कलानी को भी उस वक्त बड़ी राहत मिली जब उनकी मंगेतर संजना, जो सिंध की एक अंदरूनी तहसील मीरपुर से ताल्लुक रखती हैं, इसी वैकल्पिक हवाई मार्ग से भारत पहुंचने में कामयाब रहीं। इसके अलावा, केवल दुल्हनें ही नहीं बल्कि पाकिस्तान से आए दूल्हे भी इस हवाई यात्रा के जरिए भारत की धरती पर अपनी नई जिंदगी की शुरुआत करने पहुंचे। सिंध के घोटकी से राभेल जसवाणी अपने माता-पिता के साथ नागपुर में श्रेया से विवाह करने आए और तब से वे यहीं भारत में ही निवास कर रहे हैं। राभेल ने मीडिया और बातचीत के दौरान यह स्पष्ट रूप से साझा किया कि वे अब भारत में ही बसना चाहते हैं और जैसे ही दोनों देशों के बीच सीमाएं और बॉर्डर पूरी तरह खुलेंगे, वे अपने माता-पिता को भी यहीं अपने पास ले आएंगे।
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक धार्मिक और सामाजिक संस्था की भी बहुत बड़ी भूमिका रही, जिसने सरहद के दोनों तरफ फंसे परिवारों की आवाज को उच्च स्तर तक पहुंचाया। सिंध के घोटकी शहर में स्थित मशहूर 'शदानी दरबार' ने पाकिस्तान में फंसी हुई दुल्हनों का यह गंभीर मुद्दा पूरी मजबूती के साथ उठाया। इस ऐतिहासिक दरबार के पीठाधीश, संत युधिष्ठिरलाल शदानी (जो उत्तराधिकारियों की कतार में नौवें स्थान पर हैं) वर्तमान में रायपुर में निवास करते हैं। 18वीं सदी के महान संत शदाराम साहिब के सम्मान में स्थापित इस शदानी दरबार का बॉर्डर के दोनों तरफ बसे सिंधी समुदाय के लोगों के लिए बहुत अधिक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। समुदाय के प्रमुख नेता राजेश झांबिया ने इस बात पर प्रकाश डाला कि यह सिंध से आया पहला आधिकारिक और सफल जत्था है, जिसे प्रशासनिक अनुमति मिली है। हालांकि, अभी भी भारत में आकर शादी के बंधन में बंधने का इंतजार कर रही लगभग 300 और पाकिस्तानी लड़कियों के मामले लंबित हैं, और समुदाय ने भारत सरकार से अपील की है कि उनके लिए भी इसी प्रकार की विशेष व्यवस्था या कदम उठाए जाएं ताकि वे भी अपनी नई जिंदगी की शुरुआत कर सकें।