सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस केएम जोसेफ नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान परिसीमन प्रक्रिया पर बात कर रहे हैं।

नई दिल्ली: देश में प्रस्तावित परिसीमन को लेकर बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस केएम जोसेफ ने दक्षिण भारतीय राज्यों के प्रतिनिधित्व से जुड़ी चिंता जाहिर की है। उन्होंने आशंका जताई कि अगर भविष्य में जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण किया जाता है, तो दक्षिणी राज्यों के मतों का तुलनात्मक महत्व कम हो सकता है। जस्टिस जोसेफ ने यह टिप्पणी केरल हाई कोर्ट बार एसोसिएशन की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में की।

यह कार्यक्रम अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा की 250वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित किया गया था। अपने संबोधन में जस्टिस जोसेफ ने अमेरिकी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मौजूद ‘शासितों की सहमति’ यानी *consent of the governed* के सिद्धांत का उल्लेख किया। इसी संदर्भ में उन्होंने भारत में प्रतिनिधित्व और परिसीमन से जुड़े सवालों पर अपनी चिंता सामने रखी।

जनसंख्या आधारित परिसीमन पर क्या बोले जस्टिस जोसेफ?

जस्टिस केएम जोसेफ ने कहा कि भारत में प्रतिनिधित्व का संबंध जनसंख्या से है और पहले 1971 की जनगणना को सीटों के निर्धारण के संदर्भ में आधार बनाया गया था। अब नई जनगणना के बाद यदि प्रतिनिधियों की संख्या और सीटों का पुनर्निर्धारण जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो दक्षिणी राज्यों के सामने असंतुलन की स्थिति पैदा होने की आशंका है।

उन्होंने कहा कि यदि अभी ऐसा किया जाता है और जनगणना के आधार पर प्रतिनिधियों की संख्या तय होती है, तो दक्षिणी राज्यों के लोगों के वोटों का तुलनात्मक महत्व काफी कम हो सकता है। उनके अनुसार, इससे संसद में इन राज्यों की आवाज के प्रभाव पर भी सवाल खड़ा होगा।

जस्टिस जोसेफ ने इस चिंता को केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं माना। उन्होंने कहा कि अगर किसी क्षेत्र के मतों का महत्व अपेक्षाकृत कम हो जाता है, तो उस क्षेत्र के लोगों के लिए संसद की कार्यवाही का महत्व भी प्रभावित हो सकता है। इसी वजह से उन्होंने इस मुद्दे का कोई समाधान खोजने की जरूरत बताई।

अमेरिका के संवैधानिक मॉडल का दिया उदाहरण

अपने संबोधन में जस्टिस जोसेफ ने अमेरिका के संवैधानिक अनुभव का भी उल्लेख किया। उन्होंने अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा में सरकार की वैधता को जनता की सहमति से जोड़ने वाले सिद्धांत की चर्चा की।

इसी आधार पर उन्होंने भारत में प्रतिनिधित्व की व्यवस्था पर सवाल उठाया कि बदलती जनसंख्या के साथ सीटों के पुनर्वितरण का असर अलग-अलग राज्यों पर समान नहीं हो सकता। उनका तर्क दक्षिणी राज्यों की उस चिंता पर केंद्रित था कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को भविष्य में राजनीतिक प्रतिनिधित्व के स्तर पर नुकसान नहीं होना चाहिए।

परिसीमन को लेकर दक्षिणी राज्यों की चिंता

परिसीमन का मुद्दा पिछले कुछ समय से दक्षिण भारतीय राज्यों, खासकर तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों की राजनीति में महत्वपूर्ण बना हुआ है। इन राज्यों की चिंता यह है कि जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में अपेक्षाकृत सफल रहने के बावजूद यदि भविष्य में सीटों का आवंटन पूरी तरह नई जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो उनका लोकसभा में मौजूदा प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है।

इसी विवाद के बीच केंद्र सरकार ने अप्रैल 2026 में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संवैधानिक संशोधन का प्रस्ताव संसद में रखा था। संविधान संशोधन विधेयक में लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या बढ़ाकर अधिकतम 850 करने का प्रस्ताव था। प्रस्ताव का उद्देश्य महिला आरक्षण को लागू करने के लिए सीटों के पुनर्गठन और परिसीमन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना था।

हालांकि, 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में यह संविधान संशोधन विधेयक आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका। कुल 528 सांसदों ने मतदान किया। इनमें 298 ने विधेयक के पक्ष में और 230 ने इसके खिलाफ मतदान किया। विधेयक पारित करने के लिए 352 वोटों की जरूरत थी। इसके बाद इससे जुड़े परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेशों से संबंधित विधेयक पर भी आगे की प्रक्रिया रोक दी गई।

तमिलनाडु में भी लगातार विरोध

तमिलनाडु में परिसीमन को लेकर राजनीतिक दलों और नेताओं की ओर से लगातार चिंता जताई गई है। अगस्त में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थलपति विजय ने राज्य के सांसदों के साथ बैठक कर प्रस्तावित परिसीमन पर चर्चा की थी। बैठक में शामिल सांसदों ने केंद्र के प्रस्तावित परिसीमन अभ्यास का विरोध करने का रुख अपनाया था। हालांकि, DMK और AIADMK ने इस बैठक में हिस्सा नहीं लिया था।

इसके बाद 20 अगस्त को दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक के दौरान परिसीमन को लेकर तमिलनाडु की ओर से अपनी मौजूदा राजनीतिक हिस्सेदारी सुरक्षित रखने की मांग सामने आई। रिपोर्टों के मुताबिक, मुख्यमंत्री विजय ने केंद्र से यह आश्वासन मांगा कि जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहने वाले दक्षिणी राज्यों को परिसीमन के बाद लोकसभा में उनकी मौजूदा हिस्सेदारी के मामले में नुकसान न हो।

हालांकि, कांग्रेस ने बाद में दावा किया कि विजय के रुख में मूलभूत बदलाव नहीं आया है और तमिलनाडु के हितों से समझौता नहीं किया जाएगा। इससे साफ है कि राज्य की राजनीति में परिसीमन अभी भी एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है।

जस्टिस जोसेफ ने समाधान की जरूरत बताई

जस्टिस केएम जोसेफ की टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब परिसीमन को लेकर केंद्र और दक्षिणी राज्यों के बीच राजनीतिक बहस जारी है। उन्होंने किसी विशेष राजनीतिक दल या सरकार के पक्ष या विरोध में बात रखने के बजाय प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक सहमति से जुड़े संवैधानिक सवाल पर जोर दिया।

उनका मुख्य तर्क यह था कि नई जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व तय करने से यदि दक्षिणी राज्यों के मतों का तुलनात्मक महत्व घटता है, तो इस समस्या का समाधान तलाशना जरूरी है। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में संसद में प्रभावी प्रतिनिधित्व और जनता की सहमति से जुड़े लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं।

इस तरह जस्टिस केएम जोसेफ की टिप्पणी ने परिसीमन की बहस को केवल सीटों की संख्या और राजनीतिक गणित तक सीमित रखने के बजाय प्रतिनिधित्व, संघीय संतुलन और लोकतांत्रिक सहमति के व्यापक सवाल से जोड़ दिया है। अब इस मुद्दे पर आगे होने वाली राजनीतिक और संवैधानिक चर्चा में दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को किस तरह संबोधित किया जाता है, यह महत्वपूर्ण रहेगा।