न्याय का प्रतीक हथौड़ा और न्यायालय भवन को दिखाया गया है| 

क्या किसी महिला को गर्भावस्था के दौरान सेहत और खान-पान का ध्यान रखने की सलाह देना आपराधिक उत्पीड़न या प्रताड़ना माना जा सकता है? इस महत्वपूर्ण और संवेदनशील कानूनी सवाल पर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक बेहद स्पष्ट और अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने अपने एक फैसले में यह साफ किया है कि यदि किसी महिला को गर्भपात यानी मिसकैरेज से बचने के लिए अपने स्वास्थ्य और खान-पान का ध्यान रखने की सलाह दी जाती है, तो केवल इस आधार पर इसे प्रताड़ना या मानसिक उत्पीड़न नहीं कहा जा सकता है। हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी मृतका की ननद को आत्महत्या के उकसावे के एक मामले में जमानत देते हुए की है। इस कानूनी फैसले ने पारिवारिक विवादों और कानूनी धाराओं की व्याख्या को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है, क्योंकि यह मामला सामान्य घरेलू कहासुनी से आगे बढ़कर सीधे आत्महत्या के उकसावे के गंभीर आरोप से जुड़ा हुआ था।

यह पूरा मामला तब सामने आया जब एक महिला के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का गंभीर आरोप लगाया गया। इस मामले में आरोपी महिला मृतका की ननद थीं, जिन पर भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धारा 108 के तहत कानूनी कार्रवाई की जा रही थी। अभियोजन पक्ष की ओर से रखे गए तथ्यों में महिला के गर्भधारण और गर्भपात से जुड़े स्वास्थ्य पहलुओं को भी शामिल किया गया था। इन आरोपों में मुख्य रूप से यह बात भी शामिल थी कि आरोपी ने मृतका को अपने स्वास्थ्य और खान-पान का विशेष ध्यान रखने की सलाह दी थी। जब अदालत ने इस पूरे मामले और उपलब्ध रिकॉर्ड की गहराई से समीक्षा की, तो यह बात सामने आई कि केवल इस प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी सलाह के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि आरोपी महिला मृतका को बच्चा पैदा न करने के कारण लगातार प्रताड़ित कर रही थी। इसी तार्किक आधार पर हाईकोर्ट ने जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए आरोपी के पक्ष में राहत का फैसला सुनाया।

अदालत ने अपने इस फैसले के दौरान हेल्थ एडवाइस और क्रिमिनल हरैसमेंट यानी स्वास्थ्य संबंधी सलाह और आपराधिक उत्पीड़न के बीच के बारीक अंतर को बहुत ही बारीकी से समझाया। हाईकोर्ट का यह मानना था कि किसी व्यक्ति को सेहत से जुड़ी सावधानी बरतने के लिए कहना और उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करना दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं। अदालत ने इस बात की भी गहराई से जांच की कि क्या इस सलाह के पीछे मृतका को अपमानित करने, उस पर अनावश्यक दबाव डालने या बच्चा पैदा करने को लेकर मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की कोई स्पष्ट मंशा या दुर्भावना थी या नहीं। अदालत का यह स्पष्ट कहना था कि केवल किसी सामान्य स्वास्थ्य सलाह को स्वतः ही अपराध या प्रताड़ना जैसा आचरण मान लेना कानून की कसौटी पर किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता है।

हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि यदि ऐसी ही सलाह लगातार अपमान, धमकियों, मानसिक दबाव या गंभीर प्रताड़ना के साथ दी जाती है, तो पूरे मामले का तथ्यात्मक संदर्भ और कानूनी दायरा पूरी तरह से बदल सकता है। इसलिए किसी एक अकेली बातचीत या वाक्य के आधार पर फैसला करने के बजाय आरोपी के पूरे आचरण और परिस्थितियों को समग्रता से देखना बहुत जरूरी हो जाता है। यही एक बड़ी वजह थी कि हाईकोर्ट ने इस मामले में उपलब्ध कराए गए सभी आरोपों को आत्महत्या के उकसावे के आवश्यक कानूनी तत्वों से जोड़कर परखा, जिसके बाद जमानत का यह आदेश पारित किया गया।

भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धारा 108 के प्रावधानों पर अगर नजर डाली जाए, तो यह धारा आत्महत्या के उकसावे को एक गंभीर और दंडनीय अपराध मानती है। इस कानूनी प्रावधान के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति आत्महत्या जैसा कदम उठाता है और जांच में यह साबित होता है कि किसी अन्य व्यक्ति ने उसे इसके लिए उकसाया था, तो दोषी पाए जाने पर उसे दस वर्ष तक की लंबी जेल और जुर्माने की सजा हो सकती है। हालांकि, धारा 108 के दायरे को समझते समय BNS की धारा 45 में दी गई उकसावे की अवधारणा भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है, जिसमें किसी व्यक्ति को प्रत्यक्ष रूप से भड़काने या किसी आपराधिक साजिश में शामिल होने जैसी बातें स्पष्ट रूप से शामिल हैं। यही कारण है कि हर पारिवारिक विवाद, आपसी बहस या कठोर बातचीत अपने आप में स्वतः धारा 108 का गंभीर अपराध नहीं बन जाती है।

इस फैसले का एक और महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यह है कि गर्भावस्था से जुड़ी हर सलाह हमेशा और हर परिस्थिति में कानूनन सुरक्षित मान ली जाए, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। अदालत ने अपने आदेश में साफ किया कि हर मामले के तथ्य अलग होते हैं और यह फैसला मौजूदा मामलों के आधार पर दिया गया है। यदि किसी महिला पर बच्चा पैदा करने के लिए लगातार दबाव बनाया जाता है, उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है या धमकियां दी जाती हैं, तो कानूनी स्थिति पूरी तरह से अलग हो सकती है। कुल मिलाकर, इस पूरे मामले का सबसे बड़ा कानूनी सबक यह है कि ऐसे मामलों में अपराध साबित करने के लिए किसी के भी आचरण को केवल चुनिंदा शब्दों के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी संपूर्ण परिस्थितियों और कानूनी परिप्रेक्ष्य में परखा जाना चाहिए। हालांकि अदालत ने इस मामले में फिलहाल आरोपी को जमानत जरूर दे दी है, लेकिन इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि इस मामले की कानूनी प्रक्रिया समाप्त हो गई है, क्योंकि ट्रायल के दौरान यदि कोई नए और ठोस सबूत सामने आते हैं, तो अदालत उनका स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन करने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र होगी।