FCRA बिल पर घमासान के बीच PM मोदी से मिलेंगी सुप्रिया सुले, मानसून सत्र के आखिरी हफ्ते में बढ़ी सियासी हलचल|
मानसून सत्र के अंतिम दिनों में एफसीआरए बिल पर बढ़ी राजनीतिक हलचल, एनसीपी नेता सुप्रिया सुले ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सुप्रिया सुले की तस्वीरें एफसीआरए बिल संशोधन के संदर्भ में दिखाई दे रही हैं।
संसद का मानसून सत्र अपने अंतिम दौर में पहुंच चुका है और 13 अगस्त को इसका समापन होने वाला है। इस समयावधि के नजदीक आते ही राजनीतिक गलियारों में हलचल काफी तेज हो गई है, विशेष तौर पर फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेगुलेशन अमेंडमेंट यानी FCRA बिल और परिसीमन से जुड़े विधेयकों को लेकर सरगर्मी अपने चरम पर है। इस बीच सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही आगामी रणनीतियों को अंतिम रूप देने में जुट गए हैं। मानसून सत्र के इस आखिरी हफ्ते में राजनीतिक उठापटक और समीकरणों को साधने की कवायद ने जोर पकड़ लिया है।
इसी राजनीतिक सरगर्मी के बीच नेशनल कांग्रेस पार्टी शरद पवार गुट यानी NCP (SP) की प्रमुख नेता और सांसद सुप्रिया सुले सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करने वाली हैं। इस अहम मुलाकात में उनके साथ पार्टी के सांसदों का एक प्रतिनिधिमंडल भी मौजूद रहेगा। राजनीतिक जानकारों के अनुसार इस मुलाकात का समय बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह ऐसे समय पर हो रही है जब संसद में FCRA संशोधन बिल को लेकर तीखा विरोध देखने को मिल रहा है। हालांकि, सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर DMK और NCP (SP) जैसी विपक्षी दलों को मनाने की पुरजोर कोशिश करती नजर आ रही है।
द इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, संसद में विभिन्न लंबित और महत्वपूर्ण कानूनों पर सुप्रिया सुले के रुख ने उनकी पार्टी की सोची-समझी और स्पष्ट राजनीतिक रणनीति को उजागर कर दिया है। प्रस्तावित विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक यानी FCRA संशोधनों पर खुलकर बात करते हुए सुप्रिया सुले ने साफ कर दिया है कि उनकी पार्टी इस बिल का मौजूदा स्वरूप में पूर्ण रूप से विरोध करती है। पार्टी का स्पष्ट मानना है कि या तो इस बिल को पूरी तरह से वापस लिया जाना चाहिए या फिर इसे गहन समीक्षा के लिए संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC के पास भेजा जाना चाहिए।
परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्तावों को लेकर भी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। हालांकि, राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माने जाने वाले संविधान संशोधन बिल पर सुप्रिया सुले ने अभी किसी भी तरह का पक्का वादा करने से परहेज किया है। उनका कहना है कि यह बिल अभी पूरी तरह से सामने नहीं आया है। फिर भी, उनकी पार्टी ने पहले ही 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले पारित किए गए महिला आरक्षण के पूरे ढांचे को अपना सैद्धांतिक समर्थन देने की बात कही थी।
सुप्रिया सुले ने यह भी स्पष्ट किया है कि भविष्य में इस पर लिया जाने वाला कोई भी अंतिम निर्णय INDIA गठबंधन के अन्य प्रमुख सहयोगियों के साथ व्यापक बातचीत और आम सहमति के बाद ही तय किया जाएगा। यह बैठक इसलिए भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकार अपने इस प्रस्तावित संविधान संशोधन बिल पर संसद के भीतर व्यापक राजनीतिक सहमति जुटाने के रास्ते तलाश रही है, जिसके लिए सदन में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।
दिलचस्प बात यह है कि मानसून सत्र के इस अंतिम हफ्ते में सोमवार को लोकसभा के निर्धारित आधिकारिक एजेंडे में FCRA संशोधन बिल को पारित कराने के लिए पेश करने का कोई जिक्र शामिल नहीं है। इससे यह स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि सरकार इस विवादित कानून को लेकर फिलहाल थोड़ी नरमी बरतने के मूड में है, ताकि DMK और NCP (SP) जैसी पार्टियों को विश्वास में लिया जा सके। हालांकि ये दल इस कानून के मौजूदा प्रावधानों का लगातार विरोध कर रहे हैं, लेकिन सत्ताधारी गठबंधन इन्हें आगामी परिसीमन यानी डेलिमिटेशन की प्रक्रिया के दौरान एक संभावित समर्थक के तौर पर देख रहा है।
यदि 13 अगस्त को समाप्त होने वाले संसद के इस मानसून सत्र के बचे हुए मात्र चार दिनों के भीतर इस बिल को सदन में पास कराने के लिए पेश किया जाना है, तो इस पर होने वाली चर्चा के लिए सटीक समय का निर्धारण करना बेहद जरूरी होगा। आज होने वाली बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की बैठक से स्थिति और अधिक स्पष्ट हो जाएगी, क्योंकि इसी बैठक में सदन के आगामी एजेंडे और कामकाज की रूपरेखा तय की जाती है। सोमवार के एजेंडे में हालांकि चार अन्य बिलों को पेश किए जाने की बात जरूर है, लेकिन उसमें FCRA बिल का दूर-दूर तक कोई जिक्र नहीं किया गया है।
विपक्ष की चिंता का मुख्य कारण FCRA बिल के वे प्रावधान हैं जो भारत में विदेशों से मिलने वाले चंदे या आर्थिक सहायता पर कड़ा नियंत्रण स्थापित करते हैं और इसे अधिक पारदर्शी बनाते हैं। इस कानून को सबसे पहले वर्ष 1976 में कांग्रेस पार्टी की सरकार के कार्यकाल में लाया गया था, जिसका मूल उद्देश्य विदेशी धन के जरिए देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप या गलत गतिविधियों में लिप्त संस्थाओं पर नकेल कसना था।
नए संशोधन बिल के तहत एक विशेष अथॉरिटी के गठन का प्रस्ताव रखा गया है, जो किसी भी संस्था का FCRA रजिस्ट्रेशन रद्द होने या उसके सरेंडर किए जाने की स्थिति में विदेशी चंदे के पूरे नियंत्रण को अपने हाथ में ले लेगी। कांग्रेस पार्टी के महासचिव केसी वेणुगोपाल ने इस नए बिल को लेकर गहरी आशंका जताई है कि इसके प्रावधानों से देश भर के तमाम गैर सरकारी संगठनों यानी NGOs और विभिन्न कम्युनिटी ग्रुप्स को भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने यह भी आशंका व्यक्त की है कि यह कदम विशेष रूप से केरल राज्य के ईसाई समूहों को डराने और दबाव में लाने का एक जानबूझकर किया गया प्रयास है, जो अंततः एनजीओ पर पूरी तरह शिकंजा कस देगा।