FCRA 2026 पर अमेरिका में बढ़ी बहस, राजदूत क्वात्रा ने खोले राज; बोले- किसी धर्म को निशाना बनाने का सवाल नहीं|
अमेरिका में भारतीय राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन बिल 2026 को लेकर फैली गलतफहमियों का खंडन किया।
अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा वाशिंगटन में भारत और अमेरिका के झंडों के सामने खड़े होकर बात कर रहे हैं।
अमेरिकी धरती पर भारत के प्रस्तावित विदेशी योगदान (विनियमन) संशोधन विधेयक यानी FCRA 2026 को लेकर इन दिनों राजनीतिक गलियारों और प्रवासी संगठनों के बीच तीखी बहस छिड़ी हुई है। अमेरिका में सक्रिय कई ईसाई संगठनों और राजनीतिक हस्तियों ने इस नए कानून को लेकर गहरी चिंता जताई है और यह आरोप लगाया है कि यह संशोधन विशेष रूप से विदेशी चैरिटीज और खासकर ईसाई समुदाय को निशाना बनाने के उद्देश्य से लाया जा रहा है। इस बीच, अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने इन सभी अटकलों और दावों का बेहद कड़ाई और तथ्यों के साथ खंडन किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि इस कानून का मकसद किसी भी धर्म, नागरिक समाज या वैध चैरिटी को नुकसान पहुंचाना नहीं है, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना, जवाबदेही तय करना और देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करना है।
राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर सिलसिलेवार तरीके से अपनी बात रखते हुए उन तमाम गलतफहमियों का बिंदुवार खंडन किया जो इस नए विधेयक को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलाई जा रही हैं। उन्होंने अपने बयान की शुरुआत इस मुख्य भ्रम से की जिसमें यह दावा किया जा रहा था कि भारत सरकार सिविल सोसाइटी या गैर-सरकारी संगठनों को मिलने वाली विदेशी मदद को पूरी तरह से प्रतिबंधित करने या रोकने के लिए इस नए कानून को बना रही है। इस मिथक को खारिज करते हुए उन्होंने दो टूक कहा कि सार्वजनिक और राजनीतिक क्षेत्र में होने वाले विदेशी धन के लेन-देन को विनियमित करना किसी भी देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ एक बेहद महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने दुनिया के कई अन्य बड़े लोकतांत्रिक देशों का हवाला देते हुए कहा कि आधुनिक शासन व्यवस्था और वित्तीय पारदर्शिता के तहत इस तरह के नियम हर जगह अपनाए जाते हैं।
अपने संबोधन में राजदूत ने यह भी रेखांकित किया कि FCRA कानून का इतिहास काफी पुराना है और यह किसी भी भारतीय नागरिक को विदेशी चंदा लेने से नहीं रोकता है। इसके अलावा, यह उन सभी नागरिक समाज संगठनों के कामकाज पर भी रोक नहीं लगाता है जो नियमों का पूरी तरह से पालन करते हैं। वर्तमान में हजारों की संख्या में संस्थाएं FCRA के तहत पंजीकृत हैं और वे स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा राहत, वैज्ञानिक अनुसंधान और विभिन्न मानवीय कार्यों के लिए नियमित रूप से वैध तरीके से विदेशी फंड प्राप्त कर रही हैं। इससे यह साफ जाहिर होता है कि कानून का उद्देश्य केवल उन गतिविधियों पर नजर रखना है जो संदिग्ध दायरे में आती हैं, न कि वैध सामाजिक कार्यों को रोकना।
दूसरा बड़ा भ्रम यह फैलाया जा रहा था कि इस संशोधन के लागू होने से भारत में गैर-सरकारी संगठनों यानी NGO और चैरिटेबल संस्थाओं के कामकाज पर बेहद बुरा असर पड़ेगा और उनकी क्षमता सीमित हो जाएगी। इस दावे का कड़ा विरोध करते हुए राजदूत क्वात्रा ने आधिकारिक आंकड़ों का हवाला दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत में विदेशी फंडिंग कम होने के बजाय पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ी है। उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि वर्ष 2010-11 के दौरान जहां पंजीकृत संस्थाओं को लगभग 1.2 अरब डॉलर का विदेशी चंदा मिलता था, वहीं वित्तीय वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा बढ़कर सीधे 2.67 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। उन्होंने यह भी महत्वपूर्ण जानकारी दी कि भारत में इस समय 30 लाख से अधिक एनजीओ सक्रिय हैं, जिनमें से केवल 14,450 के पास ही FCRA का पंजीकरण है। इसका मतलब यह है कि देश का अधिकांश नागरिक समाज इस दायरे से बाहर रहकर अपने सामाजिक कार्य स्वतंत्र रूप से कर रहा है।
तीसरा मुख्य मुद्दा धार्मिक संगठनों और उनकी संपत्तियों की सुरक्षा को लेकर उठाया जा रहा था। आलोचकों का यह तर्क था कि इस नए कानून के कारण विदेशी चंदे पर निर्भर रहने वाले एनजीओ, धार्मिक चैरिटी, पूजा-स्थल, अस्पताल, स्कूल और अन्य धर्मार्थ संगठनों की संपत्तियों को सीधे तौर पर जब्त कर लिया जाएगा। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए राजदूत ने स्पष्ट किया कि भारत हमेशा से ही सही और पारदर्शी अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों का स्वागत करता है और उसने हमेशा से ऐसा कानूनी ढांचा प्रदान किया है जिसके तहत इस प्रकार का योगदान सुरक्षित रूप से हासिल किया जा सके। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी संस्था का पंजीकरण रद्द होता है या वह इसे सरेंडर करती है, तो उससे जुड़ी संपत्तियों को लेकर जो नियम लागू होते हैं, वे साल 2010 से ही देश में प्रभावी हैं। यह कोई नया प्रावधान नहीं है। इसके विपरीत, 2026 का यह नया बिल इन संपत्तियों की सुरक्षा का पूरा प्रावधान करता है और साथ ही उनकी वापसी का सुगम रास्ता भी प्रदान करता है। संगठन का पंजीकरण बहाल होते ही उसकी सारी संपत्ति और बचा हुआ फंड पूरी तरह से वापस लौटा दिया जाता है।
चौथे और सबसे संवेदनशील मिथक पर बात करते हुए राजदूत क्वात्रा ने उन दावों को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें यह कहा जा रहा था कि FCRA संशोधन किसी एक विशेष धर्म को निशाना बनाकर लाया गया है। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि यह धारणा पूरी तरह से निराधार और गलत है। यह कानून देश के सभी संगठनों पर एक समान रूप से लागू होता है, भले ही उस संस्था का संबंध किसी भी धर्म, समुदाय या वैचारिक पृष्ठभूमि से क्यों न हो। हर धर्म और संप्रदाय के संगठनों द्वारा चलाई जाने वाली आस्था-आधारित कल्याणकारी गतिविधियां और सेवा कार्य आज भी विदेशी फंडिंग के लिए पूरी तरह से योग्य बने हुए हैं और उन पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध नहीं लगाया गया है।
अंत में, राजदूत ने उन तर्कों का भी पूरी तरह से खंडन किया जिनमें यह प्रचारित किया जा रहा था कि इस तरह का सख्त कानून लाने वाला भारत अकेला देश है। उन्होंने अमेरिका का उदाहरण देते हुए याद दिलाया कि वहां वर्ष 1938 से ही FARA और FATCA जैसे सख्त कानून लागू हैं। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया ने वर्ष 2018 में और कनाडा ने वर्ष 2024 में इस तरह के कड़े नियम बनाए हैं, जबकि ब्रिटेन ने भी जुलाई 2025 में इसी तर्ज पर योजना लागू की है। यूरोपीय संघ भी इस दिशा में कड़े कानून तैयार कर रहा है। इन सभी तथ्यों को सामने रखते हुए राजदूत ने यह संदेश दिया कि भारत का यह कदम किसी पर हमला नहीं, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा और वित्तीय व्यवस्था को पारदर्शी बनाने की एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है।