तस्वीर में मंदिर प्रांगण में पारंपरिक पोशाक पहने श्रद्धालु एक साथ खड़े नजर आ रहे हैं।

कोटा, 04 सितम्बर। श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में चातुर्मासरत निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज के संघस्थ मुनि श्री 108 प्रणव सागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए संसार की वास्तविकता, वैराग्य और संत-सान्निध्य के महत्व पर गहन आध्यात्मिक प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संसार तभी तक मधुर और सुखद प्रतीत होता है, जब तक हमारे स्वार्थों की सिद्धि होती रहती है। स्वार्थ समाप्त होते ही संबंधों की वास्तविकता सामने आने लगती है।

मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य जिन परिवारजनों और सगे-संबंधियों को अपना सर्वस्व मानता है, उनके संबंधों में भी अनेक बार अपेक्षाओं और स्वार्थ का सूक्ष्म आधार जुड़ा होता है। जब तक व्यक्ति एक-दूसरे की अपेक्षाओं को पूरा करता रहता है, तब तक संबंध मधुर दिखाई देते हैं, लेकिन जैसे ही अपेक्षाएं समाप्त होती हैं, संबंधों का स्वरूप भी बदलता हुआ दिखाई देने लगता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपने परिवार और समाज से विमुख हो जाए, बल्कि संबंधों की वास्तविकता को समझते हुए उनमें आसक्ति के स्थान पर समता, करुणा और आत्मचिंतन का भाव विकसित करे।

मुनि श्री प्रणव सागर जी महाराज ने कहा कि संसार की असारता को केवल सुन लेने मात्र से वैराग्य उत्पन्न नहीं होता। जब तक संसार की वास्तविकता का अनुभव अंतरंग में नहीं उतरता, तब तक सच्ची विरक्ति जागृत नहीं हो सकती। संसार से वैराग्य का अर्थ परिवार या समाज से भाग जाना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए उसकी आसक्ति से ऊपर उठना है। अपने पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए आत्मा के स्वरूप को पहचानना ही वास्तविक साधना है।

उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति को यह अनुभव होने लगता है कि धन, पद, प्रतिष्ठा, भौतिक सुख और सांसारिक संबंध स्थायी नहीं हैं, तब उसकी दृष्टि धीरे-धीरे आत्मकल्याण की ओर मुड़ने लगती है। संसार के स्वार्थपूर्ण संबंधों को पहचानकर आत्मा के शाश्वत स्वरूप की ओर बढ़ना ही वैराग्य की प्रथम शुरुआत है। जब अंतरंग में वैराग्य का दीप प्रज्वलित होता है, तब संसार की चकाचौंध धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगती है।

संतों की शरण और समर्पण का महत्व बताते हुए मुनि श्री ने कहा कि जो व्यक्ति संतों के चरणों में अपने अहंकार को छोड़कर स्वयं को समर्पित करता है, वही सच्चे अर्थों में शिष्य कहलाने योग्य है। संतों के प्रति केवल श्रद्धा रखना पर्याप्त नहीं है। उनकी वाणी को सुनना, समझना और अपने जीवन में उतारना ही संत-सान्निध्य की वास्तविक सार्थकता है। सच्चा शिष्य वही है, जो अपने दोषों को स्वीकार करने, उन्हें दूर करने और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए सदैव तत्पर रहे। यदि संतों के चरणों में जाने के बाद भी हमारा अहंकार, स्वार्थ, मोह और कषाय जस के तस बने रहें, तो संत-सान्निध्य का वास्तविक लाभ प्राप्त नहीं हो सकता।

मुनि श्री ने श्रद्धालुओं को प्रेरणा देते हुए कहा कि जीवन में निरंतर यह विचार करना चाहिए कि क्या वास्तव में स्थायी है और क्या क्षणिक। जो क्षणिक है, उसमें अत्यधिक आसक्ति के बजाय जो शाश्वत है, उसकी साधना करना ही विवेक है। अंततः उन्होंने कहा कि संसार के स्वार्थपूर्ण आकर्षणों से ऊपर उठकर धर्म, संयम, साधना और आत्मकल्याण की ओर बढ़ना ही मनुष्य जीवन की वास्तविक सार्थकता है। अंतरंग में वैराग्य जागृत होगा, तभी मोक्षमार्ग के प्रति सच्ची रुचि और पुरुषार्थ उत्पन्न होगा।

धर्मसभा में विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक पुण्यार्जन कर धर्मलाभ अर्जित किया। अध्यक्ष श्री जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि चातुर्मास कलश स्थापना का पुण्यार्जन नवीन जी, सुनीता जी, समीर जी शालिन जी, शुभाली वेदिका जैन ने श्रद्धाभावपूर्वक किया गया। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ एवं उपाध्यक्ष श्री सुमित जैन ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन पारस, श्रीमती भारती, सौरभ, स्वाति, द्रव्या, नित्या जी, समस्त धनोप्या ने श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

महामंत्री श्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री शान्तिलाल जी, श्रीमती सुलोचना जी, श्री उमेश जी, श्रीमती सविता जी फंदोत तथा श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक जी ठोरा परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया। श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन महावीर भारती मित्तल द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

श्री अर्पित एवं श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनिश्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य उपवास के रूप में प्राप्त हुआ। श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनिश्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य भी उपवास के रूप में प्राप्त हुआ। मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

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