APJ Abdul Kalam Birthday: 74 की उम्र में सुखोई उड़ाकर कलाम ने पूरा किया बचपन का सपना
वायुसेना चयन में एक रैंक से चूकने वाले पूर्व राष्ट्रपति डॉ. कलाम ने 2006 में पुणे एयरबेस से सुखोई-30 में भरी थी ऐतिहासिक उड़ान।
देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम 8 जून 2006 को महाराष्ट्र के पुणे स्थित लोहेगांव एयरबेस पर सुखोई-30 MKI लड़ाकू विमान के कॉकपिट में बैठकर हाथ हिलाते हुए।
15 अक्टूबर को देश के पूर्व राष्ट्रपति, महान वैज्ञानिक और मिसाइल मैन डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की जयंती है। उनका जीवन संघर्ष, वैज्ञानिक उपलब्धियों और अधूरे सपनों को पूरा करने की प्रेरणादायक मिसाल रहा है। भारतीय वायुसेना में फाइटर पायलट बनने का सपना देखने वाले डॉ. कलाम चयन परीक्षा में महज एक रैंक से पीछे रह गए थे, लेकिन 74 वर्ष की उम्र में उन्होंने पुणे के लोहेगांव एयरबेस से सुखोई-30 MKI लड़ाकू विमान में उड़ान भरकर अपने बचपन के अधूरे सपने को पूरा किया।
डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम बचपन से ही भारतीय वायुसेना (IAF) में फाइटर पायलट बनना चाहते थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वायुसेना में पायलट चयन के लिए परीक्षा दी। इस परीक्षा में उन्हें नौवां स्थान मिला, जबकि उस समय केवल आठ पद उपलब्ध थे। एक रैंक से चूकने के कारण उनका फाइटर पायलट बनने का सपना अधूरा रह गया। इस असफलता से निराश होने के बावजूद उन्होंने खुद को संभाला और बाद में DRDO तथा ISRO के माध्यम से देश की मिसाइल और अंतरिक्ष क्षमताओं को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई।
डॉ. कलाम ने अपनी आत्मकथा में इस असफलता का जिक्र करते हुए बताया था कि वह उस समय बेहद निराश हो गए थे। इसके बाद वह ऋषिकेश गए, जहां उनकी मुलाकात स्वामी शिवानंद से हुई। स्वामी शिवानंद ने उन्हें असफलता स्वीकार करने की सलाह देते हुए कहा कि नियति के पास उनके लिए कोई बड़ा प्लान है। आगे चलकर राष्ट्रपति के रूप में उनकी सुखोई-30 MKI की उड़ान इस अधूरे सपने के पूरा होने का यादगार अवसर बनी।
8 जून 2006 को महाराष्ट्र के पुणे स्थित लोहेगांव एयरबेस पर एक ऐतिहासिक घटना हुई। उस समय देश के राष्ट्रपति और तीनों सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम 74 वर्ष की उम्र में भारतीय वायुसेना के सुखोई-30 MKI लड़ाकू विमान में सवार हुए। उन्होंने इस उड़ान के लिए विशेष जी-सूट पहना और विमान के कॉकपिट में बैठकर आसमान में उड़ान भरी। इस उड़ान का नेतृत्व विंग कमांडर अजय राठौर कर रहे थे।
पुणे एयरबेस के रनवे से उड़ान भरने के बाद विमान करीब 30 मिनट तक आसमान में रहा। इस दौरान सुखोई-30 MKI लगभग 20,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ा और उसकी रफ्तार करीब 1200 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंची, जो ध्वनि की गति के करीब थी। यह महज एक औपचारिक वीआईपी उड़ान नहीं थी। डॉ. कलाम ने विमान की कार्यप्रणाली और उसमें लगे उपकरणों को समझने में गहरी रुचि दिखाई।
उड़ान के दौरान उन्होंने कुछ समय के लिए लड़ाकू विमान का नियंत्रण भी अपने हाथों में लिया। विंग कमांडर अजय राठौर के निर्देश पर उन्होंने विमान को बाएं और दाएं घुमाया तथा आसमान में कुछ कलाबाजियां भी कीं। इस तरह उन्होंने उस अनुभव को करीब से महसूस किया, जिसका सपना उन्होंने युवावस्था में देखा था।
सुखोई-30 MKI के पुणे एयरबेस पर सुरक्षित उतरने के बाद डॉ. कलाम जब कॉकपिट से बाहर आए, तो उनके चेहरे पर बड़ी मुस्कान थी। उन्होंने मीडिया से भावुक होकर कहा, “मैं बचपन से ही पायलट बनना चाहता था। आज जब मैं सुखोई में उड़ रहा था, तो मुझे लगा कि मेरा वो पुराना अधूरा सपना आज आखिरकार पूरा हो गया। यह मेरे जीवन का सबसे अद्भुत और अविस्मरणीय अनुभव था।”
पत्रकारों ने जब उनसे पूछा कि 74 वर्ष की उम्र में इतनी तेज रफ्तार से उड़ते हुए उन्हें डर नहीं लगा, तो मिसाइल मैन ने हंसते हुए जवाब दिया कि जब विमान हवा में कलाबाजियां खा रहा था, तब वह विमान की अत्याधुनिक तकनीक और उपकरणों को समझने में इतने व्यस्त थे कि उन्हें डरने का समय ही नहीं मिला।
डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की यह उड़ान उनके जीवन के उस अध्याय की याद दिलाती है, जिसमें वायुसेना के चयन में एक रैंक से पीछे रह जाने के बावजूद उन्होंने अपने सपने को अधूरा नहीं छोड़ा। 8 जून 2006 को पुणे के लोहेगांव एयरबेस से सुखोई-30 MKI में भरी गई उड़ान उनके लिए बचपन के सपने को पूरा करने का अवसर बनी।