सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय परिसर में 2 मई 2012 को सुरक्षा रक्षक प्रल्हाद जोगदंडकर की हत्या के मामले की जांच करती पुलिस।   

पुणे स्थित सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय परिसर में सुरक्षा रक्षक प्रल्हाद लक्ष्मण जोगदंडकर की हत्या के मामले को 14 साल बीत चुके हैं, लेकिन अब तक पुलिस हत्यारे तक नहीं पहुंच सकी है। इस दौरान मामले की जांच के लिए कई पुलिस टीमें गठित की गईं, इनाम घोषित किए गए और कुछ संदिग्धों को हिरासत में भी लिया गया। इसके बावजूद हत्या की गुत्थी आज तक अनसुलझी है।

यह घटना 2 मई 2012 को शाम 7 बजकर 45 मिनट पर विश्वविद्यालय परिसर में सेवकों के आवास के पास हुई थी। विश्वविद्यालय में सुरक्षा रक्षक के पद पर कार्यरत प्रल्हाद लक्ष्मण जोगदंडकर की उम्र उस समय 54 वर्ष थी। घटना वाले दिन वह अपने सहकर्मी सुरक्षा रक्षक बालासाहेब निकळजे के साथ परिसर में गश्त कर रहे थे।

गश्त के दौरान दोनों को एक सुनसान स्थान पर एक युवक संदिग्ध परिस्थितियों में एक महिला के साथ दिखाई दिया। जोगदंडकर ने युवक से पूछताछ की, जिसके बाद दोनों के बीच विवाद हो गया। बताया गया कि संबंधित युवक ने शुरुआत में पैसे दिए और दोपहिया वाहन से वहां से चला गया। हालांकि, कुछ समय बाद वह दोबारा लौटा और अपने पैसे वापस मांगने लगा। इसी दौरान प्रल्हाद जोगदंडकर की छाती में गोली लग गई, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। घटनास्थल से कारतूस और 500 रुपये का एक नोट भी बरामद हुआ था।

मामले की जांच के दौरान 28 नवंबर 2013 को पुलिस ने डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में शुरुआत में सामने आए नामों में शामिल दो आरोपियों मनीष नागोरी और विलास खंडेलवाल को गिरफ्तार किया था। इसके साथ ही राहुल माळी और संतोष बागडे को भी संदेह के आधार पर गिरफ्तार किया गया। इन गिरफ्तारियों के बाद सुरक्षा रक्षक की हत्या की गुत्थी सुलझने की उम्मीद जगी थी, लेकिन पूछताछ में चारों का इस हत्या से कोई संबंध सामने नहीं आया। इस कारण जांच को कोई निर्णायक सफलता नहीं मिल सकी।

इस मामले में सहकर्मी सुरक्षा रक्षक बालासाहेब निकळजे एकमात्र प्रमुख प्रत्यक्षदर्शी थे। पुलिस को दिए गए उनके बयान के अनुसार, संदिग्ध युवक के साथ मौजूद महिला का नाम ‘अंजू’ सामने आया था। हालांकि, महिला का हुलिया स्पष्ट नहीं होने के कारण उसकी पहचान करना पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बन गया।

पुलिस ने संबंधित इलाके में ‘अंजू’ नाम की कई महिलाओं से पूछताछ की, लेकिन किसी भी प्रयास से उस महिला तक पहुंचने में सफलता नहीं मिली। जांच के दौरान पुलिस ने अलग-अलग पहलुओं पर काम किया, संदिग्धों को हिरासत में लिया और इनाम भी घोषित किए, लेकिन हत्या के पीछे कौन था, इसका खुलासा नहीं हो सका।

सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय परिसर में हुई इस हत्या के 14 साल बाद भी मामले का अनसुलझा रहना जांच की सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। प्रत्यक्षदर्शी के बयान में सामने आया महिला का नाम और घटनास्थल से मिले सबूत भी अब तक हत्यारे की पहचान तक पहुंचने में निर्णायक साबित नहीं हुए हैं।

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