छोटी सादड़ी में अपनी आजीविका के लिए कला का प्रदर्शन करते पारंपरिक बहरूपिया कलाकार।

कभी गांवों की चौपालों, मेलों और बाजारों की रौनक रही बहरूपिया कला आज बदलते दौर में अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। पेट की आग बुझाने और परिवार का भरण-पोषण करने के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर से आए बहरूपिये छोटी सादड़ी क्षेत्र के गांवों और गली-मोहल्लों में घूमकर लोगों का मनोरंजन कर रहे हैं। अलग-अलग वेशभूषा और किरदारों के जरिए लोगों के बीच पहुंचने वाले इन कलाकारों के लिए पुश्तैनी कला अब आजीविका का सहारा बनकर रह गई है।

आधुनिकता के इस दौर में मनोरंजन के साधन तेजी से बदल रहे हैं। इसका असर पारंपरिक लोककलाओं पर भी दिखाई दे रहा है। कभी ग्रामीण संस्कृति और लोक मनोरंजन की पहचान रही बहरूपिया कला धीरे-धीरे गुमनामी की ओर बढ़ रही है। छोटी सादड़ी क्षेत्र में इन दिनों दूर-दराज से पहुंचे बहरूपिये अलग-अलग रूप धारण कर गांव-गांव और गली-मोहल्लों में लोगों के सामने अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं।

कोई साधु-संत का वेश बनाकर तो कोई देवी-देवताओं और विभिन्न किरदारों का रूप धरकर लोगों के बीच पहुंच रहा है। इन कलाकारों की खासियत उनकी वेशभूषा, हाव-भाव और अदाकारी है, जिसके जरिए वे कुछ देर के लिए लोगों को हैरान कर देते हैं। बहरूपियों को देखकर बच्चे उत्साहित होते हैं, वहीं बड़े भी रुककर उनकी कला को निहारते हैं।

लोगों का मनोरंजन करने के बदले मिलने वाले कुछ रुपये ही इन कलाकारों और उनके परिवारों की आजीविका का सहारा हैं। बदलते समय के साथ बहरूपिया कला को न तो पहले जैसा सम्मान मिल रहा है और न ही इतनी आमदनी हो पा रही है कि कलाकार अपने परिवार का बेहतर तरीके से भरण-पोषण कर सकें।

इसके बावजूद ये कलाकार अपनी पुश्तैनी कला को जीवित रखने की कोशिश में सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय कर अनजान शहरों और गांवों की गलियों तक पहुंचते हैं। उनके लिए बहरूपिया कला केवल लोगों का मनोरंजन करने का माध्यम नहीं, बल्कि परिवार की रोटी-रोजी जुटाने का जरिया भी है।

एक ओर इन कलाकारों के सामने लुप्त होती लोककला को बचाने की चुनौती है, तो दूसरी ओर परिवार का पेट पालने की मजबूरी। बदलते दौर में पारंपरिक मनोरंजन के साधनों से लोगों की दूरी बढ़ने के बीच बहरूपिये अपनी कला के सहारे आजीविका चलाने की जद्दोजहद कर रहे हैं।

सवाल यह है कि यदि समय रहते ऐसी पारंपरिक कलाओं और कलाकारों को प्रोत्साहन नहीं मिला, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए बहरूपिया कला केवल किताबों और तस्वीरों तक सीमित रह सकती है। गांवों की सांस्कृतिक पहचान रही यह कला आज कलाकारों के संघर्ष के बीच अपने अस्तित्व को बचाने की कोशिश कर रही है।

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